श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 30 सितंबर, सन् 1908 ई० को | बिहार राज्य के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में हुआ।
इन्होंने हिंदी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके 'भूदेव स्वर्ण पदक जीता था। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत भी किया। 24 अप्रैल, सन् 1974 को इनका स्वर्गवास हो गया।
'दिनकर' जी ने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने यात्रा संस्मरण, आलोचना, संस्कृति, इतिहास, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में भी रचनाएँ की हैं। इनके काव्य 'उर्वशी' पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से एक लाख रुपये का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
'रेणुका', 'हुंकार', रसवंती', 'कुरुक्षेत्र', 'नीलकुसुम', 'रश्मिरथी', 'द्वंद्व गीत', 'सीपी और शंख', 'परशुराम की प्रतीक्षा', 'चक्रवाल', 'हारे को हरिनाम - इनकी प्रसिद्ध काव्य-रचनाएँ हैं; 'मिट्टी की ओर', 'अर्धनारीश्वर', 'रेती के फूल', और 'भारतीय संस्कृति के चार अध्याय -इनकी गद्य-रचनाएँ हैं।
इनकी रचनाओं में अतीत के प्रति प्रेम, पूँजीवाद के प्रति आक्रोश तथा विश्व प्रेम की झलक है। 'दिनकर' जी अपने युग के प्रतिनिधि कवि थे।
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9. संस्कृति क्या है ? (रामधारी सिंह 'दिनकर')
संस्कृति ऐसी चीज़ है जिसे लक्षणों से तो हम जान सकते हैं, किंतु उसकी परिभाषा नहीं दे सकते। कुछ अंशों में वह सभ्यता से भिन्न गुण है। अंग्रेजी में कहावत है कि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है, संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है। मोटर, महल, सड़क, हवाई जहाज, पोशाक और अच्छा भोजन, ये तथा इनके समान सारी अन्य स्थूल वस्तुएँ, संस्कृति नहीं, सभ्यता के सामान हैं, मगर पोशाक पहनने और भोजन करने में जो कला है वह संस्कृति की चीज़ है। इसी प्रकार मोटर बनाने और उसका उपयोग करने, महलों के निर्माण में रुचि का परिचय देने और सड़कों तथा हवाई जहाजों की रचना में जो ज्ञान लगता है, उसे अर्जित करने में संस्कृति अपने को व्यक्त करती है। हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत ही होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अच्छी पोशाक पहनने वाला आदमी भी तबीयत से नंगा हो सकता है और तबीयत से नंगा होना संस्कृति के खिलाफ़ बात है। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर सुसंस्कृत आदमी सभ्य ही होता है, क्योंकि सभ्यता की पहचान सुख-सुविधा और ठाट-बाट है। मगर, बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सड़े-गले झोंपड़ों में रहते हैं, जिनके पास काफ़ी कपड़े भी नहीं होते और न कपड़े पहनने के ढंग ही उन्हें मालूम होते हैं, लेकिन फिर भी उनमें विनय और सदाचार होता है, वे दूसरों के दुख से दुखी होते हैं तथा दूसरों का दुख दूर करने के लिए वे खुद मुसीबत उठाने को भी तैयार रहते हैं।
छोटा नागपुर की आदिवासी जनता पूर्ण रूप से सभ्य तो नहीं कही जा सकती, क्योंकि सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण उसके पास नहीं हैं, लेकिन दया माया, सच्चाई और सदाचार उसमें कम नहीं है। अतएव, उसे सुसंस्कृत समझने में कोई उज्र नहीं होना चाहिए। प्राचीन भारत में ऋषिगण जंगलों में रहते थे और जंगलों में वे कोठे और महल बनाकर नहीं रहते थे। फूस की झोंपड़ियों में वास करना, जंगलों के जीवों से दोस्ती और प्यार करना, किसी भी मोटे काम को अपने हाथ से करने में हिच- चिट नहीं दिखाना, पत्तों में खाना और मिट्टी के बरतनों में रसोई पकाना, यही उनकी जिंदगी थी। ये लक्षण आज की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जाते हैं, फिर भी वे ऋषिगण सुसंस्कृत ही नहीं थे बल्कि वे हमारी अति की संस्कृति का निर्माण करते थे। सभ्यता और संस्कृति में यह एक मौलिक भेद है, जिसे समझे बिना हमें कहीं-कहीं कठिनाई का सामना करना पड़ सकता
मगर वह कठिनाई कहीं-कहीं ही आती है। साधारण नियम यही है कि संस्कृति और सभ्यता की प्रगति, अधिकतर एक साथ होती है और दोनों का एक-दूसरे पर प्रभाव भी पड़ता रहता है। उदाहरण के लिए, हम जब कोई घर बनाने लगते हैं, जब स्थूल रूप में यह सभ्यता का कार्य होता है। मगर, हम घर का कौन-सा नक्शा पसंद करते हैं, इसका निर्णय हमारी सांस्कृतिक रुचि करती है। और संस्कृति की प्रेरणा से हम जैसा घर बनाते हैं, वह फिर हमारी सभ्यता का अंग बन जाता है। इस प्रकार, सभ्यता के संस्कृति पर और संस्कृति के सभ्यता पर पड़ने वाले प्रभाव का क्रम निरंतर चलता ही रहता है।
यहाँ एक यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि संस्कृति और प्रकृति में भी भेद है। गुस्सा करना मनुष्य की प्रकृति है, लोभ में पड़ना उसका स्वभाव है, ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष और काम-वासना, ये सबके सब प्रकृतिदत्त गुण हैं, मगर प्रकृति के ये गुण अगर बेरोक छोड़ दिए जाएँ तो आदमी और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाए। इसलिए, मनुष्य प्रकृति के इन आवेगों पर रोक लगाता है और कोशिश करता है - कि वह गुस्से के वश में नहीं, बल्कि गुस्सा ही उसके वश रहे वह लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष और काम-वासना का गुलाम नहीं, बल्कि ये दुर्गुण ही उसके गुलाम रहें। और उन दुर्गुणों पर आदमी जितना विजयी होता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।
निष्कर्ष यह कि संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है। यह सभ्यता के भीतर उसी तरह व्याप्त रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूलों में सुगंध और सभ्यता की अपेक्षा यह टिकाऊ भी अधिक है, क्योंकि सभ्यता की सामग्रियाँ टूट-फूटकर विनंष्ट हो सकती हैं, लेकिन संस्कृति का विनाश उतनी आसानी से नहीं किया जा सकता।
एक बात और है कि सभ्यता के उपकरण जल्दी से बटोरे भी जा सकते हैं, मगर उनके उपयोग के लिए जो उपयुक्त संस्कृति चाहिए वह तुरंत नहीं आ सकती। जो आदमी आचनक धनी हो जाता है या यक-ब-यक किसी ऊँचे पद पर पहुँच जाता है उसे चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी में एक शब्द 'अपस्टार्ट' है। 'अपस्टार्ट को लोग बुरा समझते हैं और इसलिए बुरा नहीं समझते कि अचानक धनी हो जाना या यक-ब-यक ऊँचे पर पहुँच जाना कोई बुरी बात है, बल्कि इसलिए कि धनियों तथा ऊँचे ओहदे वालों की जो संस्कृति है वह तुरंत सीखी नहीं जा सकती। इसलिए ऊँचे ओहदे पर पहुँचा हुआ व्यक्ति यदि पहले से अधिक विनयशील न हो जाए तो वह चिढ़ाने लायक हो जाता है।
संस्कृति ऐसी चीज़ नहीं जिसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास वर्षों में की जा सकती हो। अनेक शताब्दियों तक एक समाज के लोग जिस तरह खाते-पीते, रहते-सहते, पढ़ते-लिखते, सोचते-समझते और राज-काज चलाते अथवा धर्म-कर्म करते हैं, उन सभी कार्यों से उसकी संस्कृति उत्पन्न होती है। हम जो कुछ भी करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है; यहाँ तक कि हमारे उठने-बैठने, पहनने- ओढ़ने, घूमने-फिरने, और रोने-हँसने में भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है, यद्यपि हमारा कोई भी एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता। असल में, संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। इसलिए, जिस समाज में हम पैदा हुए हैं, अथवा जिस समाज से मिलकर हम जी रहे हैं उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, यद्यपि अपने जीवन में हम जो संस्कार जमा करते हैं वह भी हमारी संस्कृति का अंग बन जाता है और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ जाते हैं। इसलिए, संस्कृति वह चीज़ मानी जाती है जो हमारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। यही नहीं, बल्कि संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है। अपने यहाँ एक साधारण कहावत है कि जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है। जब हम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते हैं तब हम अचानक कह सकते हैं कि यह पूर्वजन्म का संस्कार है। संस्कार या संस्कृति, असल में, शरीर का नहीं आत्मा का गुण है। और जबकि सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।
आदिकाल से हमारे लिए जो काव्य और दर्शन रचते आए हैं, चित्र और मूर्ति बनाते आए हैं, वे हमारी संस्कृति के रचयिता हैं। आदिकाल से हम जिस-जिस रूप में शासन चलाते आए हैं, पूजा करते आए हैं, मंदिर और मकान बनाते आए हैं, नाटक और अभिनय करते आए हैं, बरतन और घर के दूसरे सामान बनाते आए हैं, कपड़े और जेवर पहनते आए हैं, शादी और श्राद्ध करते आए हैं, एवं और त्योहार मनाते आए हैं अथवा परिवार, पड़ोसी और संसार से दोस्ती या दुश्मनी का जो भी सुलूक करते आए हैं, वह सबका सब हमारी संस्कृति का ही अंश है। संस्कृति के उपकरण हमारे पुस्तकालय और संग्रहालय (म्यूजियम), नाटकशाला और सिनेमागृह ही नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक और आर्थिक संगठन भी होते हैं, क्योंकि उन पर भी हमारी रुचि और चरित्र की छाप लगी होती है।
संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब भी दो देश अथवा शत्रुता या मित्रता के कारण आपस में मिलते हैं, तब उनकी संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करने लगती है, ठीक उसी प्रकार, जैसे दो व्यक्तियों की संगति का प्रभाव दोनों पर पड़ता है। संसार में, शायद ही, ऐसा कोई देश हो जो यह दावा कर सके कि उस पर किसी अन्य देश की संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ा है। इसी प्रकार, कोई जाति भी यह नहीं कह सकती कि उस पर किसी दूसरी जाति का प्रभाव नहीं है।
जो जाति केवल देना ही जानती है, लेना कुछ नहीं, उसकी संस्कृति का एक न एक दिन दिवाला निकल जाता है। इसके विपरीत, जिस जलाशय के पानी लाने वाले दरवाजे खुले रहते हैं, उसकी संस्कृति कभी नहीं सूखती। उसमें सदा ही स्वच्छ जल लहराता रहता है और कमल के फूल खिलते रहते हैं। कूपमंडूकता और दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले डूबता है। अकसर देखा जाता है कि जब हम एक भाषा में किसी अद्भुत कला को विकसित होते देखते हैं तब तुरंत पास पड़ोस या संपर्कवाली दूसरी भाषा में हम उसके उत्स की खोज करने लगते हैं। पहले एक भाषा में 'शेली' और 'कीट्स' पैदा होते हैं तब दूसरी भाषा में रवींद्र उत्पन्न होते हैं। पहले एक देश में बुद्ध होते हैं, तब दूसरे देश में ईसा मसीह का जन्म होता है। अगर मुसलमान इस देश में नहीं आए होते तो उर्दू भाषा का जन्म नहीं होता और न मुगल-कलम की चित्रकारी ही यहाँ पैदा हुई होती। अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं हुआ होता तो भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव देर से पड़ता और राममोहन राय, दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद और गांधी में से कोई भी सुधारक उस समय जन्म नहीं लेते जिस समय उनका जन्म हुआ। जब भी दो जातियाँ मिलती हैं, उनके संपर्क या संघर्ष से जिंदगी की एक नई धारा फूट निकलती है जिसका प्रभाव दोनों पर पड़ता है। आदान-प्रदान की प्रक्रिया संस्कृति की जान है और इसी के सहारे वह अपने को जिंदा रखती है।
केवल चित्र, कविता, मूर्ति, मकान और पोशाक पर ही नहीं, सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार पर भी पड़ता है। एक देश में जो दार्शनिक और महात्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आवाज़ दूसरे देशों में भी मिलते-जुलते और महात्माओं को जन्म देती है। एक देश में जो धर्म खड़ा होता है, वह दूसरे देशों के धर्मों को भी बहुत कुछ बदल देता है। यही नहीं, बल्कि प्राचीन जगत में तो बहुत-से ऐसे देवी-देवता भी मिलते हैं जो कई जातियों के संस्कारों से निकलकर एक जगह जमा हुए हैं। एक जाति का धार्मिक रिवाज़
दूसरी जाति का रिवाज़ बन जाता है और एक देश की आदत दूसरे देश के लोगों की आदत में समा जाती है। अतएव, सांस्कृतिक दृष्टि से वह देश और वह जाति अधिक शक्तिशालिनी और महान समझी जानी चाहिए जिसने विश्व के अधिक- से-अधिक देशों, अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियों को अपने भीतर जज्ब करके, उन्हें पचा करके, बड़े-से बड़े समन्वय को उत्पन्न किया है। भारत देश और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है, क्योंकि यहाँ की सामाजिक संस्कृति में अधिक-से-अधिक जातियों की संस्कृतियाँ पची हुई हैं।
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