मजबूरी (मन्नू भंडारी) ISC गद्य संकलन (ISC Collection of Short Stories & Essays )Prescribed for classes XI & XII ISC Examination

10. मन्नू भंडारी


मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल, सन् 1931 को भानपुरा जिला मंदसौर (मध्य प्रदेश) में हुआ।


भंडारी जी की कहानियों में किसी-न-किसी समस्या या मूलभूत प्रश्न को अत्यंत कुशलता से उठाया गया है। इनकी कहानियों में परंपराओं, मान्यताओं, प्रथाओं, रूढ़ियों, अनर्गल विश्वासों एवं मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सहजता से उभारा गया है। अब तक इनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं- 'एक प्लेट सैलाब', 'मैं हार गई', 'यही सच है', 'त्रिशंकु', 'आपका बंटी', 'महाभोज'- इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।


इनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए हिंदी अकादमी के शिखर सम्मान सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कार शामिल हैं। 

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10. मजबूरी (मन्नू भंडारी)


"बेटू को खिलावे जो एक घड़ी, उसे पिन्हाऊँ मैं सोने की घड़ी। बेटू को खिलावे जो एक पहर,


उसे दिलाऊँ मैं सोने की मोहर ।"


बूढ़ी अम्मा ज़ोर-ज़ोर से यह लोरी गा रही थीं, और लाल मिट्टी से कमरा लीप रही थीं। उनके घोंसले जैसे बालों में से एक मोटी-सी लट निकलकर उनके चेहरे पर लटक आई थी, और उनके हिलते हुए सिर के साथ हिल-हिलकर मानो लोरी पर ताल ठोक रही थी । बरतन मलने के लिए आई नर्बदा ने जब यह देखा तो हैरत में आ गईं, बोलीं- "अम्मा, यह क्या हो रहा है? कल तो गठिया में जुड़ी पड़ी थीं, दरद के मारे तन-बदन की सुध नहीं थी, और आज ऐसी सरदी में आँगन लीपने बैठ गईं। "



एक क्षण को अम्मा का हाथ रुका, फिर पुलकित स्वर में वे बोलीं, "अरी नर्बदा, मेरा बेटू आ रहा है कल " और फिर गाने के लहजे में बोलीं, “बेटू मेरा आवेगा...'


"ओहो ! तो रामेश्वर लल्ला आ रहे हैं कल।" नर्बदा बोली।


"मैं कह नहीं रही थी कि छुट्टी मिली नहीं कि वह दौड़ा आएगा? अम्मा के मारे तो उसके प्राण सूखते हैं। इतना बड़ा हो गया फिर भी यहाँ आएगा तो रात में एक बार मेरी गोदी में ज़रूर सोएगा, पर इस बार मैं कह दूँगी कि चल, मैं तुझे गोदी में नहीं लूँगी, अब तू गोदी में सोएगा कि बेटू?" और वे हँस पड़ीं जैसे कोई भारी मज़ाक कर दिया हो। फिर एकाएक काम का ख्याल आ जाने से बोलीं, “ले री, मैंने खड़िया भिगो रखी है, जरा बाहर के आँगन में माँड दे। बस, ऐसा माँडना कि सब देखते ही रह जाएँ। क्या करूँ, आजकल हाथ काँपने लगा है, नहीं तो मैं ही माँड लेती।"

नर्बदा को खड़िया के काम में लगाकर वे फिर गाने लग:


"आओ री चिड़िया चून करो बेटू ऊपर राइ नून करो


नून करो, नून करो 11


"ले मैं तो भूल ही गई क्या है इससे आगे! रामेश्वर छोटा था तो ढेरों याद थीं। उसके बाद तो छोटा बच्चा ही घर में नहीं रहा, सो सब भूल गई। मेरा रामेश्वर तो बिना लोरी सुने कभी सोता ही नहीं था। बेटू भी जरूर उसी पर पड़ा होगा। " अब तो दौड़ता फिरता होगा आँगन में।" और उनकी धुंधली आँखों के आगे जैसे दौड़ते-फिरते बेटू के चित्र बनने-बिगड़ने लगे। उसकी कल्पना में खोई-खोई वे बोलती गईं, "पहले बहू लेकर आई थी तब तो दो महीने का था। बस, पालने में पड़ा-पड़ा हाथ-पैर मारता था और मैं जाकर खड़ी हो जाती थी तो टुकुर-टुकुर मुझे ही निहारा करता था। सूरत भी एकदम रामेश्वर पर ही पड़ी है उसकी। अब तो खुद देख लेना। सारा घर नापता फिरेगा।" और वे हँस पड़ीं। इन सब कल्पनाओं से ही उनका शरीर रोमांचित हो उठा।


अम्मा का काम समाप्त हुआ तो मिट्टी में सनी दोनों हथेलियों को ज़मीन पर पूरे जोर से टिकाते हुए उन्होंने उठने का प्रयत्न किया पर एक सर्द आह-सी उनके मुँह से निकलकर रह गई। वे उठ नहीं पाईं तो बड़े ही कातर स्वर में बोलीं, “अरे नर्बदा, मुझे जरा उठा देरी, घुटने तो जैसे फिर जुड़ गए।"


"जुड़ेंगे तो सही। ऐसी सर्दी में कब से मिट्टी में सनी बैठी हो ! बेटे-बहू आ रहे हैं तो ऐसी क्या नवाई हो रही है, सभी के घर आते हैं।" और नर्बदा ने अम्मा को सहारा देकर उठाया, उनके हाथ धुलाए और खटिया पर लिटा दिया।


"तू भी कैसी बात करती है, नर्बदा ! तीन बरस बाद मेरा बेटा आ रहा है, और मैं आँगन भी न लीपूँ ?"


"तीन बरस बाद आ रहा है तो मैं तो यही कहूँगी कि उनमें मोह-माया नहीं है। तुम यों ही मरी जाती हो उसके पीछे।"

देख नर्मदा, मेरे रामेश्वर के लिए कुछ मत कहना। यह तो मैं ही जानती हूँ कि तीन-तीन बरस मुझसे दूर रहकर उसके दिन कैसे बीतते हैं, पर क्या करे, नौकरी तो आखिर नौकरी ही है। मेरे पास आज लाखों का धन होता तो बेटे को यों नौकरी काले परदेस दुरा देती, पर..." और उनके कुछ क्षण पहले पुलकते चेहरे पर मायूसी छा गई। आँखें अनायास ही डबडबा आईं।


नर्मदा यहाँ बरसों से काम करती है, अम्मा के लिए उसके मन में अपार श्रद्धा है, पर बेटे के प्रसंग को लेकर वह जब-तब उनका दिल दुखा दिया करती है। 1 कुछ और खरी-खोटी सुनाने का उसका मन हो रहा था, पर आज वह मानो अम्मा पर तरस खाकर चुप रह गई। जब तक वह काम करती रहीं, अम्मा शून्य में ताकती जाने क्या। सोचती रहीं, बोलीं एक शब्द भी नहीं। जब वह जाने लगी तो न चाहकर भी उन्हें कहना पड़ा, "तू समय ग्वाले को कहती जाना कि कल जल्दी दूध दे जाए, और अब से दूध ज्यादा लगेगा। बच्चे वाले घर में तो दूध पूरा ही रहना चाहिए और जब तक वे लोग यहाँ रहें तब तक तू चौका बरतन करके यहीं रहा करना। घर में पाँच प्राणी हैं तो काम तो निकल ही आता है, फिर बच्चे का साथ रहेगा। देने- लेने की चिंता मत करना, मैं रामेश्वर को एक कहूँगी, तो वह पाँच देगा।"


कुछ तो गठिया के दर्द ने और कुछ नर्बदा की बातों ने अम्मा का उत्साह तोड़ दिया। बहुत से काम उन्होंने सोच रखे थे, पर वे कुछ न कर सकीं। बस, अपनी खाट पर पड़े पड़े भूली-बिसरी लोरियाँ याद करके गुनगुनाती रहीं। धीरे-धीरे रात के अंधकार में उनके मन की मायूसी भी डूब गई और वे भोर होने से पहले ही उठ बैठीं। घुटने का दर्द मन के उत्साह में खो गया, और बेटे-पोते से मिलने की उमंग में मौसम की ठंडक भी जैसे जाती रही। सात बजते-बजते तो वे सब घर ही पहुँच जाएँगे। साथ छोटा बच्चा है, दूध तो गरम करके रख ही दूँ। फिर उन दोनों को भी वो चाय की आदत होगी। ऐसी सर्दी में चाय तैयार नहीं मिलेगी तो अम्मा को क्या कहेंगे भला? दूसरा चूल्हा भी जला दूँ, नहाने को गरम पानी भी तो चाहिएगा।


उस कड़कती सर्दी में ठिठुरते ठिठुरते अम्मा ने बेटे-बहू को गरम करने के सारे •आयोजन कर डाले। फिर सोचा, लगे हाथ भी काट ही दूँ, नहीं तो वह इधर आएंगे और उधर मैं चूल्हे में सिर देकर बैठ जाऊँगी। तीन बरसों में मेरा बेटा आ रहा है. बड़ी दो घड़ी उससे बात भी नहीं करूँगी ? इनका क्या ये तो अपने राजी- खुशी पूछकर औषधालय चल देंगे। तरकारी भी कट गई... अब क्या करें ? अम्मा अपने को इतना व्यस्त कर देना चाहती थीं जिससे प्रतीक्षा के बोझिल क्षण महसूस न हों, पर समय जैसे बीत ही नहीं रहा था तभी दूर कहीं घोड़ों के घुंघुरुओं की आवाज आई और ताँगा अम्मा के घर के सामने रुका। अम्मा पागलों की तरह दरवाजे की ओर दौड़ पड़ीं। रामेश्वर की गोद से उन्होंने झपटकर बच्चे को ऐसे छीना मानो किसी चोर-उचक्के के हाथ से वे अपने बच्चे को छीन रही हों, और कसकर उसे सीने से चिपका लिया। चरण छूते हुए रामेश्वर की पीठ पर हाथ फेरते हुए दूसरे हाथ के घेरे में उसे भी लपेट लिया।


बच्चा एकाएक इतना प्यार और शारीरिक कष्ट पाकर से उठा और माँ के पास जाने के लिए मचलने लगा। वे उसके आँसू पोंछने लगीं और उनकी अपनी आँखों से भी आँसुओं की धारा बहने लगी। पुचकारने पर भी जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो बहू की ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, "अभी मुझे पहचानता नहीं। एक बार मुझे पहचानने लगेगा तो छोड़ेगा नहीं।" उपेक्षित-सी एक ओर खड़ी बहू ने बच्चे को ले लिया।


चाय-पानी हो गया और रामेश्वर नहाने चला गया तो अम्मा ने बहू को अकेले पाकर कहा, "खबर तो दी होती बहू कि तुम्हारे बच्चा होने वाला है?"


बहू ने झेंपते हुए उत्तर दिया, "यह भी कोई लिखने की बात थी, अम्मा!" फिर जरा रुकते-रुकते कहा, मानो कहने का साहस बटोर रही हो, "अम्मा, इस बार बेटू को आप ही रखेंगी। जैसे भी हो मैं यहाँ हूँ तब तक उसे अपने से हिला लीजिए। मैं तो इसके मारे ही परेशान थी, दो-दो को तो.....


अम्मा आँख फाड़-फाड़कर ऐसे देख रही थीं मानो जो कुछ सुन रही हैं उस पर विश्वास करें या नहीं। फिर एकाएक बोल पड़ीं, “तुम कह क्या रही हो, बहू ? बेटू को मेरे पास छोड़ जाओगी, मेरे पास ! सच? हे भगवान्, तुम्हारी सब साथ पूरी हो, तुम बड़भागी होओ। मेरे इस सूने घर में एक बच्चा रहेगा। मेरा तो जन्म सफल हो जाएगा।" फिर वे एकाएक रो पड़ीं, "तुम क्या जानो, बहू! अपने कलेजे के टुकड़े को निकालकर बंबई भेज दिया। रामेश्वर के बिना यह घर तो मसान जैसा लगता है। ये ठहरे संत आदमी, दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं। मैं अकेली ये पहाड़ जैसे दिन कैसे काटती हूँ सो मैं ही जानती हूँ। भगवान् तुम्हें दूसरा भी बेटा दे, तुम उसे पाल लेना। मैं समझँगी तुमने मेरा रामेश्वर लेकर मुझे अपना रामेश्वर दे दिया। पर देखो, अपनी बात से मुड़ना नहीं... मैं...मैं..." तभी रामेश्वर ने ठिठुरते हुए रसोई में प्रवेश किया, "अम्मा एक अँगीठी जरा इधर रख दो। बंबई में रहकर तो सरदी सहने की आदत नहीं रही। यहाँ तो नहाते ही जैसे जम गया।”


अम्मा ने अँगीठी रामेश्वर के पास सरका दी। तभी रामेश्वर का ध्यान अम्मा के कपड़ों की ओर गया, "यह क्या, अम्मा, तुम कुछ भी गरम कपड़ा नहीं पहने हो! सरदी खा गई तो बीमार पड़ जाओगी। फिर तुम्हें गठिया की भी तो तकलीफ़ है। ऐसे कैसे चलेगा? न हो तो बनवा लो कपड़े, रुपए मैं दे दूँगा।"


पर यह सब अनसुना करके अम्मा बोर्ली, "देख, आज बहू ने कह दिया है कि बेटू अब मेरे पास रहेगा । तू कहीं टाल मत जाना, बात पक्की हो गई। आज से बेटू मेरा हुआ!"


" अरे हम सभी तो तुम्हारे हैं, अम्मा। बोलो, नहीं हैं?" परिहास के स्वर में रामेश्वर बोला।


"हो क्यों नहीं। मेरे नहीं तो और किसके हो? पर बेटू आज से मेरे पास


रहेगा।" अम्मा ने कहा।


तभी वैद्यराज जी कुछ खाली शीशियाँ लेकर आए। अम्मा बोली, “सुनते हो जी, इस बार बेटू यहीं रहेगा। बेचारी बहू खुद अभी बच्ची है, दो-दो को कैसे सँभालेगी? और फिर पहले बच्चे पर तो यों भी दादी का हक होता है।" उनके हाथों की गति बढ़ गई थी और वे अब उठने-बैठने में ज़रा भी तकलीफ़ महसूस नहीं कर रही थीं।

दोपहर को नर्वदा से भी अम्मा ने कहा, "बहू के तो फिर बच्चा होने वाला है, बेचारी दो-दो को कैसे सँभालेगी, सो मुझसे कहने लगी- अम्मा बेटू को तो तुम्हें ही रखना पड़ेगा। उसे कहने में बड़ा संकोच हो रहा था कि मुझे बुढ़ापे में तकलीफ़ होगी, पर तू ही बता, घर के बच्चे को रखने में कैसी तकलीफ़ भला। ऐसे समय में घर के ही लोग काम न आएँगे तो कौन आएँगे भला?"


इसके बाद घर में जो कोई भी आया उसे यही खबर सुनाई गई। अम्मा इस बात का इतना प्रचार कर देना चाहती थीं कि यदि फिर किसी कारण से बहू का मन फिर भी जाए तो शरम के मारे ही वह अपना इरादा न बदल पाए। अम्मा का सारा दिन बेटू के खिलाने में और उसकी नोन-राई करने में ही बीतता! जाने कैसी-कैसी औरतें घर में आती हैं। तंदरुस्त सुंदर बच्चे को कड़ी नज़र से देख जाएँ तो लेने के देने पड़ जाएँ। बेटू को लेकर उनके शिथिल और नीरस जीवन में नया उत्साह आ गया था। घुटनों के दर्द के मारे कहाँ तो वे अपने शरीर का बोझ ही नहीं ढो पाती थीं, और कहाँ अब वे बेटू को फिरती हैं। शाम को उसके साथ आँख-मिचौनी खेलतीं। बेटू का घोड़ा बनकर आँगन में फिरतीं। बेटू के साथ-साथ उनका भी जैसे बचपन लौट आया था। देखने वाले अम्मा के पागलपन पर हँसते, पर इसकी उन्हें जरा भी चिंता नहीं थी। रामेश्वर ने टोका, "अम्मा, क्यों उसे लादे फिरती हो? यों ही तुम्हारे घुटनों में दर्द रहता है।" तो बिगड़ पड़ीं, "कैसी बातें करता है, रामेश्वर ? उसमें भी कोई वज़न है जो उठाना भारी पड़े? फूल जैसा तो हलका है, खाली- खाली दोनों बेला मिलते टोक दिया। माँ-बाप की नज़र ही सबसे ज्यादा लगती है बच्चों को, तभी तो बेटू एक दिन ठीक नहीं रहता। "


निश्चित समय पर दूध पिलाना, शीशी में दूध भरना, बाद में उसकी सफ़ाई आदि सब काम अम्मा के लिए बिलकुल नए थे। उन्होंने तो रामेश्वर को अपने ढंग से पाला था। जब बच्चा रोया, झट दूध पिला दिया। दूध के लिए भी समय देखना पड़ता है, यह बात उनके लिए एकदम नई थी। दो साल तक तो उन्होंने रामेश्वर को अपना दूध पिलाया था, उसके बाद गिलास से पिलाती थीं। यह शीशी का नखरा उस जमाने में था ही नहीं, और होगा भी तो शहरों में, पर रमा से बड़ी लगन और तत्परता से जिद करके औषधालय की दीवार घड़ी, जो पिछले बीस वर्षों से वहीं लगी थीं, उतरवाकर घर में लगवाई, और घड़ी देखना सीखा। उनके एकाकी जीवन में समय का कोई महत्त्व ही नहीं था। न पति को दफ्तर जाना पड़ता था. न बच्चों को स्कूल, जो समय पर कोई काम करना पड़े, पर अब एकाएक ही उनी घड़ी की आवश्यकता महसूस होने लगी थी। यों तो उनकी याददाश्त बड़ी कमजोर थी, पर दूध के समय उन्होंने जो याद किए ये उनको वह कभी नहीं भूलीं। शुरू-शुरू में यह सब उन्हें बड़ा अटपटा-सा लगा, पर फिर भी वे सारा काम बड़ी सतर्कता से करतीं। शीशी में दूध भरते समय उनका बूढ़ा हाथ अकसर काँप जाया करता था, और दूध बाहर को गिर जाता था। उस समय वे एक असफल विद्यार्थी की तरह सफाई पेश करती थीं, "बहुत जल्दी सीख लूँगी, बहू जरा सा हाथ काँप गया था। फिर शीशी का मुँह भी तो कितना छोटा है।" उनका कहने का भाव ऐसा होता मानो वे कह रही हों कि इस छोटी सी ग़लती के कारण ही कहीं तुम बेटू को मत ले जाना।


बीस दिन बाद जब बहू ने अपनी माँ के घर प्रयाण किया तो बेटू ने न जिद की, न वह रोया ही। माँ के कड़े नियंत्रण के बाद दादी के असीम दुलार में रहना, जहाँ कोई बंधन नहीं, अंकुश नहीं, बेटू को बड़ा अच्छा लगा। बहू चली गई, अम्मा ने निश्चिंतता की एक साँस ली। महीना बीतते-बीतते ख़बर आई कि बहू के दूसरा भी लड़का हुआ है। अम्मा की छाती पर से जैसे एक भारी बोझा हट गया। का एक काँटा जो रमा के जाने के बाद भी उनके मन में चुभा करता था, वह भी निकल गया। बेटू अब मेरा है, पूरी तरह मेरा है, यह भावना उसी दिन पूरी तरह उनके मन में जम पाई।


जाने से पहले रामेश्वर ने अम्मा और पिता जी के लिए ढेर सारे कपड़े बनवाए थे। अम्मा सारे मोहल्ले की औरतों को दिखाती फिरतीं। जो कोई आता उसी से कहतों, "अम्मा के पीछे तो बस रामेश्वर पागल है, न आगे की सोचता है न पीछे  की। उसका बस चले तो मुझ पर ही सारा घर लुटा दे। लाख मना करती रही, पागल ने एक बात नहीं मानी। अब बुढ़ापे में ये छपी साड़ियाँ पहनकर कहाँ जाऊँगी? पर वह क्यों सुनने लगा ?" उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर चमक आ जाती और वे आँखें मूंदकर अपने बेटे के चिरायु होने की कामना करतीं। जब रामेश्वर के जाने का समय आया तो उन्होंने रो-रोकर घर भर दिया। हिचकियाँ लेते हुए बोली, "देख रामेश्वर, यह तीन-तीन बरस तक घर का मुँह न देखने वाली बात अब नहीं चलेगी। साल में एक बार तो आ ही जाया कर, मेरे लाल! नौकरी की जगह नौकरी है, और माँ-बाप की जगह माँ-बाप ! मेरी तबीयत भी ठीक नहीं रहती, किसी दिन भी आँख मुँदी रह जाएगी तो मैं तेरी सूरत को भी तरस जाऊँगी। सो कम-से-कम अपनी इस बुढ़िया माँ को..." पर आगे वे कुछ नहीं कह सकीं, बस फूट-फूटकर रोने लगीं। आँसू- भरी आँखों से वे रामेश्वर के ताँगे को तब तक देखती रहीं, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया। उसके बाद उन्होंने कसकर बेटू को अपनी छाती से चिपका लिया।


दूसरे साल रामेश्वर नहीं आया, केवल रमा आई, शायद बेटू को देखने पर बेटू को जो देखा तो उसका माथा ठनक गया। जिस बेटू को वह छोड़ गई थी, और जिसे वह देख रही है, दोनों में कोई सामंजस्य ही नहीं था। बात-बात में उसकी ज़िद देखकर रमा का खून खौल जाता। खाना वह दादी अम्मा के हाथ से खाता, और सारे दिन चरता रहता था। रात में सोता तो दादी माँ के दोनों अंगूठे पकड़कर सोता, और जब तक दादी अम्मा उसे लोरी नहीं सुनाती तब तक उसे नींद नहीं आती थी। सारे दिन दादी अम्मा की धोती का पल्ला पकड़कर उनके पीछे-पीछे घूमा करता, और शाम को गली-मुहल्ले के गंदे-गंदे बच्चों के बीच खेलता। उसे देखकर कौन कहेगा कि यह एक पढ़ी-लिखी सभ्य लड़को का बच्चा है? घर के सामने से जो कोई भी फेरीवाला निकलजाता उससे बेटू कुछ न कुछ जरूर खरीदता, न दिलवाने से जमीन-आसमान एक कर देता, और मचल मचलकर सारे आँगन में लोटता !


आखिर रमा को जबान खोलनी ही पड़ी, "अम्मा, आपने तो इसे बिगाड़कर धूल कर रखा है, इस तरह कैसे चलेगा?" 

दादी माँ ने हँसते हुए बड़े ही सहज भाव से कहा, "अरे बचपन में कौन जिद नहीं करता, बहू! रामेश्वर भी ऐसे ही करता था। यह तो सच हूबहू उसी पर पड़ा है। समय आने पर सब अपने आप छूट जाएगा। यही तो उमर होती है ज़िद करने की, साल-दो साल और कर ले, फिर अपने आप सब कुछ छूट जाएगा!" और वे | मुग्ध से गोद में बैठे हुए बेटू के बालों में अंगुलियों चलाने लगीं। रमा खून का घूँट पीकर रह गई। रमा की इच्छा हुई कि बेटू को अपने साथ लेती जाए, पर एक साल का पप्पू ही उसे इतना परेशान करता था कि दोनों को एक साथ रखने का साहस नहीं । बंबई जाते ही उसने अम्मा के पास जरा खरी-खरी भाषा में पत्र पहुँचाने आरंभ कर दिए। जैसे ही वह चार साल का हुआ, रमा ने लिख दिया कि " अम्मा, अब उसे वहाँ के नर्सरी स्कूल में भर्ती करवा कम-से-कम कुछ तमीज़ तो सीखेगा!" चिट्ठियाँ पड़तीं तो अम्मा को लगता, बहू का दिमाग बौरा गया है। भला चार साल का दूध पीता बच्चा कहीं स्कूल जा सकता है? रमा के पत्र आते रहे और अम्मा का डरी अपने ढंग से चलता रहा।


दो साल बाद फिर रमा और रामेश्वर अपने तीन साल के पप्पू को लेकर आए। एने अंग्रेजी की छोटी-छोटी कविताएँ याद कर रखी थीं और बड़े अदब के साथ बोलता था। अभी दो महीने पहले ही रमा ने उसे वहाँ के अंग्रेज़ी स्कूल में भर्ती करवाया था, पर बेटू वैसा ही था, जैसा रमा उसे छोड़ गई थी। उम्र में वह जरूर बड़ा हो गया था, बाकी सब कुछ वैसा ही था। रमा उठते-बैठते रामेश्वर से कहती, “जैसे भी हो, इस बार बेटू को अपने साथ लेकर ही जाना होगा। यही हाल रहा तो इसकी जिंदगी चौपट हो जाएगी। यह भी कोई ढंग है भला।"


"अम्मा को बड़ा दुख होगा, फिर बेटू तुम्हारे पास तरा भी तो नहीं आता, वह अम्मा को छोड़कर कैसे रहेगा? ये सारी बातें सोच लो !" रामेश्वर इस प्रसंग को जैसे टालना चाहता था।


"अम्मा के दुख की बात मैं मानती हूँ।" रमा ने अपने आवेश को दबाते हुए कहा, "पर जब उन्हें लिखा कि स्कूल में डाल दो तो उनसे नहीं हुआ। जैसे बताती हूँ, वैसे तो रखती नहीं। अब इनके दो दिन के सुख के लिए बच्चे का सारा भविष्य बिगाड़कर रख दूँ ?" उसका गला भर आया था।


रामेश्वर बेचारा धर्म-संकट में था। उसे पत्नी की बातों में भी सार नज़र आता था और वह अम्मा की भावनाओं को भी ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था, सो बिना कुछ निर्णय दिए सारी बात रमा पर छोड़कर वह बंबई लौट आया। रमा कभी मिठाई दिलाकर, कभी तांगे में घुमाकर बेटू को अपने से हिलाने की कोशिश करने लगी। बेटू को तांगे में घूमने का बेहद शौक था, जो कम ही पूरा होता था अम्मा को कभी स्वप्न में भी ख्याल नही था कि रमा पप्पू के रहते हुए भी बेटू को ले जाने का प्रस्ताव रखेगी। जिस दिन उन्होंने सुना, उनके पैरों तले की ज़मीन सरक गई जब रमा ने बेटू को उनके पास छोड़ने का प्रस्ताव रखा था तब भी एकाएक उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ था। ठीक उसी प्रकार ले जाने की बात पर भी उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। फिर भी काँपते स्वर में कहा, "कैसी बात करती हो, बहू मेरे बिना वह पल-भर भी तो नहीं रहता। इतना बड़ा हो गया, फिर भी जब तक मैं कौर नहीं देती तब तक खाता नहीं, सो एकाएक मुझसे दूर कैसे रहेगा?"


"नहीं रहेगा तो थोड़े दिन रो लेगा, आखिर इसकी पढ़ाई का सिलसिला भी तो जमाना है। अम्मा ! देखो, पप्पू स्कूल जाने लगा और यह अभी तुम्हारा पल्ला पकड़े- पकड़े ही घूमता है।"


" अरे पढ़ लेगा, बहू, पढ़ लेगा! उमर आएगी तो पढ़ लेगा। मत सोचना कि मैं गँवार ही रहने दूँगी। रामेश्वर को भी तो मैंने पाला-पोसा है। उसे क्या गंवार ही रख दिया? फिर यह तो मुझे और भी प्यारा है। मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है। इसे तो मैं खूब पढ़ाऊँगी तू चिंता मत कर, बहू, इसे ले जाने की बात मत कर!" और वे फफक-फफककर रो पड़ीं।


रमा की आँखों में भी आँसू तो आ गए फिर भी उसने अपने पर काबू पाते हुए और स्वर को भरसक कोमल बनाकर कहा, "मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहती, अम्मा, पर आपके इस जरूरत से ज्यादा प्यार ने ही तो इसे बिगाड़कर धूल कर दिया है। एक भी आदत तो इसमें अच्छी नहीं है। यदि आप सचमुच ही इसे प्यार करती है और इसका भला चाहती हैं तो इसे मेरे साथ भेज दीजिए, और इसके साथ दुश्मनी ही निभानी है तो रखिए इसे अपने पास।" कहने के बाद ही रमा को लगा जैसे बहुत कड़ी बात कह गई है।


...मैं अपने बेटू के साथ दुश्मनी निभाऊँगी? मैं उसकी दुश्मन हूँ? मैं... मैं? तू मेरे प्यार की परीक्षा लेना चाहती है? पर ऐसी कठिन परीक्षा तो मत ले, बहू, इससे जो तू मेरे प्राण ही ले ले !" और वे फूट-फूटकर रोने लगीं। कुछ देर बाद एकाएक 'स्वरसंवत करती हुई बोलीं- "ले जा बहू ले जा मेरा बेटू फूले-फले, पढ़- लिखकर लायक बने, इससे बढ़कर खुशी की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है? मेरा क्या है, अपनी चार दिन की हँसी-खुशी के लिए मैं तेरे बच्चे की जिंदगी नहीं बिगाड़ेंगी। मैं अनपढ़-गँवार औरत ठहरी, इसे लायक कहाँ से बनाऊँगी ? तू इसे ले जा! चार दिन को मेरी जिंदगी में हँसी-खुशी आ गई, इसी में तेरा बड़ा जस मानूँगी।" और रमा कुछ कहे उसके पहले ही उन्होंने रसोईघर में आकर भीतर से किवाड़ बंद कर लिए।


रमा को खुद इस बात से बड़ा दुख हो रहा था, पर बच्चे की बात सोचकर वह निर्णय बदलने में को असमर्थ पा रही थी। यही सोच-सोचकर वह अपने मन की तसल्ली दे रही थी कि समय का मरहम अम्मा के घाव को अपने-आप भर देगा।


दो दिन बाद औषधालय के एकमात्र नौकर और दोनों बच्चों को लेकर रमा अपनी माँ के यहाँ चल पड़ी। बेटू को बताया ही नहीं गया कि रमा उसे अपने साथ ले जा रही है। रोज़ की भाँति ताँगे में घूमने के लालच से वह चला गया। जाते समय कह गया, "दादी माँ, मैं तेरे लिए मिठाई और गोली लेकर आऊँगा।" दादी अम्मा ने उसे कलेजे से लगा लिया। एक बार उनकी इच्छा हुई कि वह बेटू को बता दे कि रमा उसे हमेशा के लिए उनसे अलग करके ले जा रही है, पर फिर भी वे चुप रहीं।


उसके बाद जो भी कोई घर में आया, अपार आश्चर्य से उसने पूछा, "अरे, बहू बैटू को ले गई? तुम तो कहती थीं कि बेटू अब तुम्हारे पास ही रहेगा?" अम्मा को लगा जैसे किसी ने उनके कलेजे पर गरम सलाख दाग दी हो। तिलमिलाकर जवाब देतों,"कहती तो थी, पर अब रखा नहीं जाता। गठिया के मारे मेरा तो उठना-बैठना तक हराम हो रहा है, सो मैंने ही कह दिया कि, बहू, अब पप्पू बड़ा हुआ सो बेटू को ले जाओ।"


" अरे अम्मा, एक पल तो तुम उसे छोड़ती नहीं थीं, अब रह लोगी उसके बिना?"


"नहीं रह सकती तो भेजती ही क्यों? अब यह कोई बच्चे पालने की उमर हैं। भला! जिसकी थाती उसी को सौंपी। बुढ़ापा है, कुछ भजन-पूजन ही कर लूँ। उसके मारे तो मेरा सब कुछ छूट गया था!" बड़े ही संदिग्ध भाव से अम्मा की इस दलील को औरतें स्वीकार कर पाती थीं। आज अम्मा के पास कोई काम नहीं था करने को, सो खाली आँगन में दर्दीले स्वर में एक लोरी गुनगुना रही थीं। शाम को गुब्बारेवाला आया, 'बुढ़िया के बाल' वाला आया, मिठाई के खिलौने बेचनेवाला आया तो बुझे स्वर में अम्मा ने सबको यही जवाब दिया "जाओ भाई, जाओ! आज तुम्हारा ग्राहक नहीं है। उसे मैंने उसकी अम्मा के साथ भेज दिया। अब यहाँ मत आया करो, कभी मत आया करो, कोई तुम्हारी चीज नहीं खरीदेगा।" और उनका मन सुबक उठता, पर उनकी आँखों के आँसू जैसे सूख गए थे।


तीसरे दिन औषधालय का नौकर वापस आया तो सबसे पहले खबर दी कि दादी अम्मा को याद करते-करते बेटू को बुखार आ गया और वह उसे भरे बुखार में छोड़कर आया है। वह रमा के हाथ से न कुछ खाता है, न दवाई पीता है। अम्मा ने सुना तो ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई। वे पागलों की भाँति दौड़ती हुई औषधालय में पहुँचीं, "अरे सुनते हो, बेटू रो-रोकर बीमार हो गया है। मैं तो पहले ही जानती थी कि वह मेरे बिना रहेगा नहीं। पर बहू को कौन समझाए ? अब तो रात की गाड़ी से ही जाकर मुझे उसे लाना होगा। वह तो रो-रोकर जान दे देगा। हे भगवान्, मेरी मति पर भी पत्थर पड़ गए थे जो बहू की बात मान गई।" अम्मा रोती थी और कपड़े ठीक करती जाती थी। नर्बदा आई तो आश्चर्य से बोली, "कहाँ की तैयारी कर रही हो, अम्मा?"


"अरे, शिब्बू बहू को छोड़कर लौटा तो बताया कि बेटू ने तो रो-रोकर बुखार चढ़ा लिया। मैं तो भेजकर अपनी तरफ से निश्चिंत हो गई थी, पर वह रह सकता है क्या? उसके तो प्राण मुझमें कुछ ऐसे पड़ गए थे कि क्या बताऊँ! कोई अगले जन्म का संस्कार ही समझ और अब जाकर लाना पड़ेगा, नहीं तो छोरा रो-रोकर प्राण दे देगा।" गर्व और आनंद से उनकी छाती फूल गई।


तीसरे दिन ही बेटू को लेकर वे लौट आई। जिसने देखा उसी ने कहा-"अरे चार दिन में ही बच्चा सूख गया।"


" सूखेगा नहीं? कुछ तो खाया नहीं, और एक पल को आँसू नहीं टूटा। मैं तो


सोचती थी कि बहू के हवाले करके सुख से पूजा-पाठ करूँगी, पर अब यह रहता


भी तो नहीं।"


एक साल उन्होंने इसी प्रकार निकाल दिया। रमा बंबई से आई और फिर बेटू का वही रवैया देखा तो सोचा कि वह उसे सीधे बंबई ले जाती तो यह सारा कांड नहीं होता। अम्मा बंबई तक आ नहीं सकती थीं। सो एक बार फिर दादी माँ को रुलाकर, उनके मना करने पर भी, वह बेटू को लेकर बंबई के लिए चल पड़ी। जाने किस आशा से अम्मा ने सारी जमा-पूँजी खर्च करके शिब्बू को साथ कर दिया। रमा मना करती रही कि अब दोनों बच्चे बड़े हैं और वह सँभाल लेगी, पर अम्मा ने शिब्बू को साथ भेज ही दिया।


दूसरे दिन से जो कोई भी आता, अम्मा उसी के सामने यह मनौती मानतीं कि किसी तरह बेटू रमा के पास हिल जाए तो वह सवा रुपए का परसाद चढ़ाएँगी ! उच्च स्वर से वह रात-दिन रट लगाए रहतीं कि बेटू मुझे किसी तरह भूल जाए, पर सात दिनों के बाद जब शिब्बू लौटकर आया तो वह ऐसे दौड़ पड़ीं मानो वह बेटू को लेकर ही आया हो। झपटकर उन्होंने पूछा, "मेरा बेटू कहाँ है? मेरा बेटू ठीक है, शिब्बू ? तुझे मैंने किसलिए भेजा था?" उनका स्वर बुरी तरह काँप रहा था।

"इस बार तो, अम्मा, बहू जी ने बेटू को हिला लिया। वहाँ बहू जी के मकान में बहुत सारे बच्चे हैं, उन सबसे दोस्ती हो गई, सो खूब खेलता है। ट्राम, बस, बगीचे, झूले-इन सब में उसका मन लग गया ।" शिब्बू ने बताया तो अम्मा शून्य- पथराई आँखों से उसे ऐसे देख रही थीं मानो कुछ समझ ही नहीं रही हों। शिब्बू कहे चला जा रहा था, "चलो तुम्हारी चिंता दूर हुई। मैं तो, अम्मा, दो दिन इसी मारे ज्यादा रुक कि कहीं रोया तो अपने साथ ले आऊँगा, पर इस बार बहू जी ने उसे समझा दिया, और वह भी समझ गया। अब वहाँ जम जाएगा। अब तो तुम परसाद चढ़ाओ, अम्मा, और मजे से भजन-पूजन करो।"


एकाएक जैसे अम्मा की चेतना लौट आई, "क्या कहा ? बेटू मुझे भूल गया? सच, मेरी बड़ी चिंता दूर हुई। इस बार भगवान् ने मेरी सुन ली। जरूर परसाद चढ़ाऊँगी रे! मेरे बच्चे के जी का कलेश मिटा, मैं परसाद नहीं चढ़ाऊँगी भला !" और फिर गीली आँखों और काँपते हाथों से उन्होंने जेब से सवा रुपया निकालकर शिब्बू को देते हुए कहा, "ले, पेड़े, लेता आ, अब परसाद चढ़ाकर बाँट ही दूँ। कौन, नर्बदा? सुना, नर्बदा, बेटू मुझे भूल गया-बस, भूल ही गया!" और उन्होंने भर-भर आती आँखें आँचल से पोंछी और हँस पड़ीं। 

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