क्या निराश हुआ जाए ? (हजारी प्रसाद द्विवेदी) ISC गद्य संकलन (ISC Collection of Short Stories & Essays )Prescribed for classes XI & XII ISC Examination

7. हजारी प्रसाद द्विवेदी

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त, सन् 1907 को ओझवलिया, बलिया, उत्तर प्रदेश में हुआ। इनका बचपन का नाम बैजनाथ द्विवेदी था ।

19 मई, सन् 1979 को इनका देहांत हो गया।

इनकी हिंदी की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्म

विभूषण उपाधि से अलंकृत किया गया। द्विवेदी जी को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बाँग्ला आदि भाषाओं का गहरा ज्ञान था तथा इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्मशास्त्र आदि पर भी हासिल था। द्विवेदी जी एक उत्कृष्ट निबंधकार तथा उपन्यासकार थे। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास', 'भारतीय धर्मसाधना', 'सूरदास', 'कबीर', "अशोक के फूल', 'कल्पलता', 'कुटज', 'पुनर्नवा', 'चारु चंद्रलेखा' आदि प्रमुख कृतियाँ हैं ।

द्विवेदी जी की भाषा विषयानुकूल तथा संस्कृतनिष्ठ है।

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7. क्या निराश हुआ जाए ? (हजारी प्रसाद द्विवेदी)

मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता है। समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार भरे रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है, कि लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ऊँचे पद पर हैं, उनमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं। एक बहुत बड़े आदमी ने एक बार मुझसे कहा था, कि इस समय सुखी वही है, जो कुछ नहीं करता। जो कुछ भी करेगा, उसमें दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जाएँगे और दोषों को बढ़ा- चढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमें नहीं होते ? यही कारण है, कि हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है; गुणी कम या बिलकुल ही नहीं। स्थिति अगर ऐसी है, तो निश्चय ही चिंता का विषय है।




क्या यही भारतवर्ष है, जिसका सपना तिलक और गांधी ने देखा था ? विवेकानंद और रामतीर्थ का आध्यात्मिक ऊँचाई वाला भारतवर्ष कहाँ है ? रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान संस्कृत-सभ्यता वाला भारतवर्ष किस अतीत के गवर में डूब गया ? आर्य और द्रविड़, हिंदू और मुसलमान, यूरोपीय और भारतीय आदर्शों की मिलनभूमि 'महामानव-समुद्र' क्या सूख ही गया ? मेरा मन कहता है, ऐसा नहीं सकता। हमारे मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा। ऊपर की सतह पर जितना भी कोलाहल और उथल-पुथल क्यों न दिखाई दे रही हो, नीचे शांत अचंचल गांभीर्य में अब भी भारत महान है, है। यह सही है, कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है, कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलाने वाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं, झूठ और फ़रेब का रोज़गार करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।
बात नई नहीं है, पर इसकी वीभत्सता शायद पहले कभी इतनी विकराल होकर नहीं प्रकट हुई। आज से चार सौ साल पहले बाबा तुलसीदास ने कुछ ऐसा ही माहौल देखा था। वे व्याकुल भाव से कह गए हैं :

सीदत साधु, साधुता शोभति

खल विलसत, द्रुतमति भई ।

परंतु आधुनिक साधनों और सुविधाओं के साथ-साथ धन संकट की प्रवृत्ति को जैसा बढ़ावा इस समय मिला है, वैसा उन दिनों नहीं था। भलाई का दुराव बेहिसाब बढ़ गया है और उसी अनुपात में, बल्कि कुछ अधिक मात्रा में ही, 'साधुता का सोच' भी बढ़ा है। तुलसीदास ने महान जीवन मूल्यों में आस्था नहीं छोड़ी थी। लगता है, उनके समकालीन अधिकांश लोगों ने भी नहीं छोड़ी थी, पर आज भी छोड़ने की तरूरत नहीं है।

ऊपर-ऊपर जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह बहुत साल की मनुष्य-निर्मित नीतियों की त्रुटियों की देन है। सदा मनुष्य बुद्धि नई परिस्थितियों का सामना करने के लिए नए सामाजिक विधि-निषेधों को बनाती है, उनके ठीक साबित न होने पर उन्हें बदलती है। ऊहापोह, ग्रहण-त्याग, संशोधन परिवर्तन का सिलसिला चलता ही रहता है। उथल-पुथल भी होती है, कई बार दुर्व्यवस्था के कारण निरीह व्यक्तियों का कष्ट भी बढ़ता है, बहुधा सुविधाभोगी वर्ग की स्थिति में परिवर्तन के कारण व्यक्ति विशेष पूरी तरह ध्वंस हो जाता है। नियम-कानून सबके लिए बनाए जाते हैं, पर मनुष्य समाज बहुत जटिल प्रक्रियाओं से होकर गुजरकर और भी जटिल होता है, सबके लिए कभी भी एक ही नियम सुखकर नहीं होते। मनुष्य की बुद्धि से निर्मित व्यवस्था हमेशा त्रुटि-युक्त होती है। सामयिक कायदे-कानून कभी-कभी युग पूर्व से परीक्षित आदर्शों से टकराते भी हैं, इससे ऊपरी सतह आलोड़ित भी होती है। पहले भी हुआ कि आगे भी होगा उसे देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।

भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को महत्त्व नहीं दिया है। उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान आंतरिक तत्व स्थिर भाव से बैठा हुआ है, परम और धरम है। लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उनको प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन और
बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत निकृष्ट आचरण है। भारतवर्ष ने कभी-भी इनको महत्त्व नहीं दिया, इन्हें सदा संयम के बंधन से बाँधकर रखने का प्रयास किया है, परंतु, भूख की उपेक्षा नहीं की जा सकती, बीमार के लिए दवा की उपेक्षा नहीं की जा सकती, गुमराह को ठीक रास्ते पर से आने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

हुआ यह है, कि इस देश के कोटि-कोटि दरिद्रजनों की हीन अवस्था को दूर करने के लिए ऐसे अनेक कायदे और क़ानून बनाए गए हैं, जो कृषि, उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति को अधिक उन्नत और सुचारु बनाने के लक्ष्य से प्रेरित हैं, अपने आप में यह लक्ष्य बहुत ही उत्तम है, परंतु जिन लोगों को इन कार्यों में लगना है, उनका मन सब समय पवित्र नहीं होता। प्रायः वे ही लक्ष्य को भूल जाते हैं और अपनी ही सुख-सुविधा की ओर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं। व्यक्ति का चित्त सब समय आदर्शों द्वारा चालित नहीं होता। जितने बड़े पैमाने पर इन क्षेत्रों में मनुष्य की उन्नति के विधान बनाए गए, उतनी ही मात्रा में लोभ, मोह जैसे विकार भी विस्तृत होते गए; लक्ष्य की बात भूल गई। आदर्शों को मजाक का विषय बनाया गया और संयम को दकियानूसी मान लिया गया। परिणाम जो होना था, वह हो रहा है। यह कुछ थोड़े-से लोगों के बढ़ते हुए लोभ का नतीजा है, किंतु इससे भारतवर्ष के पुराने आदर्श और भी अधिक स्पष्ट रूप से महान और उपयोगी दिखाई देने लगे हैं।

भारतवर्ष सदा क़ानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक क़ानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है। यही कारण है, कि जो लोग धर्म-भीरु, रूढ़िग्रस्त हैं, वे क़ानून की त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।

इस बात के पर्याप्त प्रमाण खोजे जा सकते हैं, कि समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी हो रहा हो, भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है, कि धर्म कानून से बड़ी चीज़ है। अब भी सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बने हुए हैं। वे दब अवश्य गए हैं, लेकिन नष्ट नहीं हुए हैं। मनुष्य आज भी मनुष्य से प्रेम करता है, का सम्मान करता है, झूठ और चोरी को गलत समझता है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाने को पाप समझता है और कठिनाई में पड़े हुए। बेबस लोगों की सहायता करने में अपने को कृतकृत्य अनुभव करता है। हर आदमी व्यक्तिगत जीवन में इस बात का अनुभव करता है। समाचार-पत्रों में जो भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश है, वह यही साबित करता है, कि हम ऐसी चीज़ों को गलत समझते हैं और समाज में उन तत्त्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं, जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं।

दोषों का पर्दाफ़ाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करते समय उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्त्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है। सैंकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं, जिन्हें उजागर करने से लोकचित्त में अच्छाई के प्रति भावना जागती है।

एक बार रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते हुए गलती से मैंने दस की बजाए सौ रुपए का नोट दिया और जल्दी-जल्दी गाड़ी में आकर बैठ गया। थोड़ी देर में टिकट बाबू उन दिनों के सैकिंड क्लास के डिब्बे में हर आदमी का चेहरा पहचानता हुआ उपस्थित हुआ। उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी विनम्रता के साथ मेरे हाथ में नब्बे रुपये दिए और बोला- "यह बहुत बड़ी गलती हो गई थी। आपने भी नहीं देखा, मैंने भी नहीं देखा।" उसके चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा थी। मैं चकित रह गया।

कैसे कहूँ, कि दुनिया से सच्चाई और ईमानदारी लुप्त हो गई है ? वैसी अनेक अवांछित घटनाएँ भी हुईं हैं, परंतु यह एक घटना ठगी और वंचना की अनेक घटनाओं से अधिक शक्तिशाली है।

एक बार मैं बस में यात्रा कर रहा था। मेरे साथ मेरी पत्नी और तीन बच्चे थे। बस में कुछ ख़राबी थी; रुक-रुककर चलती थी। गंतव्य से कोई आठ किलोमीटर पहले ही एक निर्जन सुनसान स्थान में बस ने जवाब दे दिया। रात के कोई होंगे।
बस में यात्री घबरा गए। कंडक्टर ऊपर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना। लोगों को संदेह हो गया, कि हमें धोखा दिया जा रहा है। बस में बैठे लोगों ने तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। किसी ने कहा- "यहाँ डकैती होती है; दो दिन पहले इसी तरह एक बस को लूटा गया था।" परिवार सहित अकेला मैं ही था। बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे। पानी का कहीं ठिकाना न था। ऊपर से आदमियों का डर समा गया था।

कुछ नौजवानों ने ड्राइवर को पकड़कर मारने-पीटने का हिसाब बनाया। ड्राइवर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। लोगों ने उसे पकड़ लिया। वह बड़े कातर ढंग से मेरी ओर देखने लगा और बोला- "हम लोग बस का कोई उपाय कर रहे हैं। 'बचाइए, ये लोग मारेंगे।" डर तो मेरे मन में भी था, पर उसकी कातर मुद्रा देखकर मैंने यात्रियों को समझाया, कि मारना ठीक नहीं है, परंतु यात्री इतने घबराए हुए थे, कि वे मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुए। कहने लगे "इसकी बातों में मत आइए धोखा दे रहा है। कंडक्टर को पहले ही डाकुओं के यहाँ भेज दिया है।"

मैं भी बहुत भयभीत था, पर ड्राइवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़- दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे। मेरी और पत्नी की हालत बुरी थी। लोगों ने ड्राइवर को मारा-पीटा तो नहीं, पर उसे बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा। कोई भी दुर्घटना होती हैं, तो पहले ड्राइवर को समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ, कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारी बस का कंडक्टर भी बैठा हुआ है। उसने आते ही कहा-" अड्डे से नई बस लाया हूँ, इस बस पर बैठिए।" यह बस चलने लायक नहीं है।" फिर मेरे पास एक लोटे में पानी और थोड़ा दूध लेकर आया और बोला- "पंडित जी, बच्चों का रोना मुझसे देखा नहीं गया। वहीं दूध मिल गया; थोड़ा लेता आया।" यात्रियों में फिर जान में जान आई। सबने उसे धन्यवाद दिया। ड्राइवर से माफ़ी माँगी और बारह बजे से पहले ही सब लोग बस अड्डे पहुँच गए।

कैसे कहूँ, मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई! कैसे कहूँ, कि लोगों में दया माया रह ही नहीं गई! जीवन में न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुईं हैं, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता।-

ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है, परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिली है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखूं, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परंतु ऐसी घटनाएँ बहुत कम नहीं हैं, जहाँ लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाढ़स दिया है और हिम्मत बँधाई है। कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने एक प्रार्थना गीत में भगवान से प्रार्थना की थी कि- "संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े तो ऐसे अवसरों पर भी हे प्रभो! ऐसी शक्ति दो, कि मैं तुम्हारे ऊपर संदेह न करूँ।"

संसारेते लभिले क्षति, पाइले तोमाके जेन न करि संशय । सुधु

मनुष्य की बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुँच रही हैं, तो उन्हें बदलना होगा। वस्तुतः आए दिन इन्हें बदला ही जा रहा है, लेकिन अब भी आशा की ज्योति बुझी नहीं है। महान भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी।

मेरे मन ! निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

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