जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में 30 जनवरी, सन् 1890 ई० में हुआ। 15 नवंबर, 1937 को अल्पायु में ही इनका निधन हो गया।
आरंभ में ये ब्रजभाषा में रचना करते थे, पर बाद में खड़ी बोली की ओर आकर्षित हुए। 1918 में 'चित्राधार' नाम से आपका प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। इसके बाद 'कानन कुसुम', 'आँसू', 'कामायनी' आदि प्रकाशित हुए। इनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं- 'झरना', 'लहर', 'प्रेम पथिक', 'छाया', "प्रतिध्वनि', 'आकाशदीप', 'आँधी', 'इंद्रजाल इनके कहानी संग्रह है। "कंका', 'तितली' इनके उपन्यास तथा अजातशत्रु' 'स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त', एवं 'ध्रुवस्वामिनी' इनकी प्रसिद्ध नाट्य-कृतियाँ हैं।
'कामायनी'- काव्य पर इन्हें 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ। प्रसाद की कहानियों में सांस्कृतिक चेतना के दर्शन होते हैं।
निष्कर्षतः इनकी कहानियों में भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रीयता का स्वर गुंजित होता है।
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6. दासी (जयशंकर प्रसाद)
यह खेल किसको दिखा रहे हो बलराज ? कहते हुए फिरोजा ने युवक की कलाई पकड़ ली। युवक की मुट्ठी में एक भयानक छुरा चमक रहा था। उसने झुंझलाकर फिरोजा की तरफ देखा । वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। फिरोजा युवती से अधिक बालिका थी। अल्हड़पन, चंचलता और हँसी से बनी हुई वह तुर्क बाला सब हृदयों के स्नेह के समीप थी। नीली नसों से जकड़ी हुई बलराज की पुष्ट कलाई उन कोमल उँगलियों के बीच में शिथिल हो गई। उसने कहा- फिरोजा, तुम मेरे सुख में बाधा दे रही हो !
-सुख जीने में है बलराज! ऐसी हरी-भरी दुनिया, फूल-बेलों से सजे हुए नदियों के सुंदर किनारे, सुनहला सवेरा, चाँदी की रातें इन सबों से मुँह मोड़कर आँखें बंद कर लेना! कभी नहीं! सबसे बढ़कर तो इसमें हम लोगों की उछल-कूद का तमाशा है। मैं तुम्हें मरने न दूँगी।
-क्यों ?
-यों ही बेकार मर जाना! वाह, ऐसा नहीं हो सकता। जिहून के किनारे तुर्कों से लड़ते हुए मर जाना दूसरी बात थी तब मैं तुम्हारी कब्र बनवाती, उस पर फूल चढ़ाती ; पर इस गजनी नदी के किनारे अपना छुरा अपने कलेजे में भोंककर मर जाना बचपना भी तो नहीं है।
बलराज ने देखा, सुलतान मसऊद के शिल्पकला-प्रेम की गंभीर प्रतिमा, गजनी नदी पर एक कमानी वाला पुल अपनी उदास छाया जलधारा पर डाल रहा है। उसने कहा- "वही तो, न जाने क्यों मैं उसी दिन नहीं मरा, जिस दिन मेरे इतने वीर साथी कटार से लिपटकर इसी गजनी की गोद में सोने चले गए। फिरोज़ा! उन वीर आत्माओं का वह शोचनीय अंत! तुम उस अपमान को नहीं समझ सकती हो।"
-सुलतान ने सिल्जूको से हारे हुए तुर्क और हिंदू दोनों को ही नौकरी से अलग कर दिया। पर तुर्कों ने तो मरने की बात नहीं सोची ?
- कुछ भी हो, तुर्क सुलतान के अपने लोगों में हैं और हिंदू बेगाने ही हैं। फिरोज़ा! यह अपमान मरने से बढ़कर है।
-और आज किसलिए मरने जा रहे थे ?
वह सुनकर क्या करोगी ? कहकर बलराज छुरा फेंककर एक लंबी साँस लेकर चुप हो रहा। फिरोजा ने उसका कंधा पकड़कर हिलाते हुए कहा-
सुनूँगी क्यों नहीं। अपनी... हाँ, उसी के लिए। कौन है वह कैसी है ? बलराज गोरी-सी है, मेरी ही तरह वह भी दुबली-पतली है न ? कानों में कुछ पहनती है ? और गले में?
नहीं फिरोजा, मेरी ही तरह वह भी कंगाल है। मैंने उससे कहा था कि लड़ाई पर जाऊँगा और सुलतान की लूट में मुझे भी चांदी-सोने की डेरी मिलेगी, जब अमीर हो जाऊँगा, तब आकर तुमसे व्याह करूँगा।"
-तब भी मरने जा रहे थे। खाली हाथ ही लौटकर उससे भेंट करने की, उसे एक बार देख लेने की, तुम्हारी इच्छा न हुई। तुम बड़े पाजी हो जाओ, मरो या जियो, मैं तुमसे न बोलूंगी।
सचमुच फिरोजा ने मुँह फेर लिया। वह जैसे रूठ गई थी। बलराज को उसके भोलेपन पर हँसी न आ सकी। वह सोचने लगा, फिरोजा के हृदय में कितना स्नेह ! उल्लास है ? उसने पूछा- फिरोजा, तुम भी तो लड़ाई में पकड़ी हुई गुलामी भुगत रही हो। क्या तुमने कभी अपने जीवन पर विचार किया है? किस बात का उल्लास है तुम्हें?
-मैं अब गुलामी में नहीं रह सकूँगी। अहमद जब हिंदुस्तान जाने लगा था, तभी उसने राजा साहब से कहा था कि मैं एक हज़ार सोने के सिक्के भेजूँगा। भाई तिलक तुम उसे लेकर फिरोजा को छोड़ देना और वह हिंदुस्तान आना चाहे तो उसे भेज देना। अब वह थैली आती ही होगी। मैं छुटकारा पा जाऊँगी और गुलाम ही रहने पर रोने की कौन-सी बात है ? मर जाने की इतनी जल्दी क्यों ? तुम देख नहीं रहे हो कि तुर्कों में एक नई लहर आई है। दुनिया ने उनके लिए जैसे छाती खोल दी है। जो आज गुलाम है; वही कल सुलतान हो सकता है। फिर रोना किस बात का, जितनी देर हँस सकती हूँ, उस समय को रोने में क्यों बिताऊँ ?
- तुम्हारा सुखमय जीवन और भी लंबा हो, फिरोज़ा; किंतु आज तुमने जो मुझे मरने से रोक दिया, यह अच्छा नहीं किया।
कहती तो हूँ, बेकार न मरो। क्या तुम्हारे मरने के लिए कोई
कुछ भी नहीं, फिरोजा! हमारी धार्मिक भावनाएँ बँटी हुई हैं, सामाजिक जीवन दंभ से और राजनीतिक क्षेत्र कलह और स्वार्थ से जकड़ा हुआ है। शक्तियाँ है, पर उनका कोई केंद्र नहीं किस पर अभिमान हो, किसके लिए प्राण हूँ?
-दुत्! चले जाओ हिंदुस्तान में, मरने के लिए कुछ खोजो। मिल ही जाएगा, जाओ न ..... कहीं वह तुम्हारी.... मिल जाय तो किसी झोंपड़ी ही में काट लेना। न सही अमीरी, किसी तरह तो कटेगी। जितने दिन जीने के हों, उन पर भरोसा रखना।
-बलराज ! न जाने क्यों मैं तुम्हें मरने देना नहीं चाहती। वह तुम्हारी राह देखती हुई कहीं जी रही हो, तब! आह! कभी उसे देख पाती तो उसका मुँह ही चूम लेती। कितना प्यार होगा उसके छोटे-से हृदय में? लो, ये पाँच दिरम, मुझे कल राजा साहब ने इनाम के दिए हैं। इन्हें लेते जाओ देखो, उससे जाकर भेंट करना।
फिरोजा की आँखों में आँसू भरे थे, तब भी वह जैसे हँस रही थी। सहसा वह पाँच धातु के टुकड़ों को बलराज के हाथ पर रखकर झाड़ियों में घुस गई। बलराज चुपचाप अपने हाथ पर के उन चमकीले टुकड़ों को देख रहा था। हाथ कुछ झुक रहा था। धीरे-धीरे टुकड़े उसके हाथ से खिसक पड़े। वह बैठ गया सामने एक पुरुष खड़ा मुसकरा रहा था।
-बलराज !
-राजा साहब। जैसे आँख खोलते हुए बलराज ने कहा, और उठकर खड़ा हो
गया। - मैं सब सुन रहा था। तुम हिंदुस्तान चले जाओ। मैं भी तुमको यही सलाह दूंगा। किंतु, एक बात है।
-वह क्या राजा साहब ?
-मैं तुम्हारे दुख का अनुभव कर रहा हूँ। जो बातें अभी फिरोजा से कही हैं, उन्हें सुनकर मेरा हृदय विचलित हो उठा है। किंतु क्या करूँ ? आकांक्षा का नशा पीलिया है। वही मुझे बेबस किए है। जिस दुख से मनुष्य छाती फाड़कर चिल्लाने लगता हो, सिर पीटने लगता हो, वैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मैं सिर नीचा कर चुप रहना अच्छा समझता हूँ। क्या ही अच्छा होता कि जिस सुख में आनंदातिरेक से मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, उसे भी मुसकराकर टाल दिया करूँ । सो
नहीं होता। एक साधारण स्थिति से मैं सुलतान के सलाहकारों के पद तक तो पहुँच गया हूँ। मैं भी हिंदुस्तान का ही एक कंगाल था। प्रतिदिन की मर्यादा-वृद्धि, राजकीय और उसमें सुख की अनुभूति ने मेरे जीवन को पहेली बनाकर जाने दो। मैंने सुलतान के दरबार से जितना सीखा है, वही मेरे लिए बहुत है। एक बनावटी गंभीरता ! छल-पूर्ण विनय! ओह, कितना भीषण है, वह विचार! मैं धीरे- धीरे इतना बन गया हूँ कि मेरी सहृदयता घूँघट पलटने नहीं पाती। लोगों को मेरी छाती में हृदय के होने का संदेह हो चला है। फिर भी मैं तुमसे अपनी सहृदयता क्यों प्रकट करूँ ? तब भी आज तुमने मेरे स्वभाव की धारा का बाँध तोड़ दिया है। और मैं...... ।
- बस राजा साहब, और कुछ न कहिए। मैं जाता हूँ। मैं समझ गया कि.... -ठहरी, मुझे अधिक अवकाश नहीं है। कल यहाँ से कुछ विद्रोही गुलाम, अहमद नियाल्तगीन के पास लाहौर जाने वाले हैं, उन्हीं के साथ तुम चले जाओ। यह लो !- कहते हुए सुलतान के विश्वासी राजा तिलक ने बलराज के हाथों में थैली रख दी। बलराज वहाँ से चुपचाप चल पड़ा।
तिलक सुलतान महमूद का अत्यंत विश्वासपात्र हिंदू कर्मचारी था। अपने बुद्धि-बल से कट्टर यवनों के बीच अपनी प्रतिष्ठा दृढ़ रखने के कारण सुलतान मसऊद के शासन काल में भी वह उपेक्षा का पात्र नहीं था। फिर भी वह अपने को हिंदू ही समझता था, चाहे अन्य लोग उसे जो भी समझते रहे हों। बलराज की बातें वह सुन चुका था। आज उसकी मनोवृत्तियों में भयानक हलचल थी। सहसा उसने पुकारा-फिरोजा
शाड़ियों से निकलकर फिरोजा ने उसके सामने सिर झुका दिया। तिलक ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कोमल स्वर में पूछा- फिरोजा, तुम अहमद के पास हिंदुस्तान जाना चाहती हो ?
फ़िरोज़ा के हृदय में कंपन होने लगा। वह कुछ न बोली। तिलक ने कहा- डरो मत, साफ़-साफ़ कहो।
-क्या अहमद ने आपके पास दीनारें भेज दीं ? - कहकर फिरोजा ने अपनी उत्कंठा-भरी आँखें उठाई। तिलक ने हँसकर कहा-सो तो उसने नहीं भेजीं, तब भी तुम जाना चाहती हो, तो मुझसे कहो।
मैं क्या कह सकती हूँ ? जैसी मेरी 1- कहते कहते उसकी आँखों में आँसू छलछला उठे। तिलक ने कहा- फिरोजा, तुम जा सकती हो। कुछ सोने के टुकड़ों के लिए मैं तुम्हारा हृदय नहीं कुचलना चाहता।
- सच ! आश्चर्य भरी कृतज्ञता उसकी वाणी में थी।
-सच फिरोजा अहमद मेरा मित्र है, और भी एक काम के लिए तुमको भेज रहा हूँ। उसे जाकर समझाओ कि वह अपनी सेना लेकर के बाहर इधर-उधर हिंदुस्तान में लूट-मार न किया करे। मैं कुछ ही दिनों में सुलतान से कहकर खजाने और मालगुजारी का अधिकार भी उसी को दिला दूंगा। थोड़ा समझकर धीरे-धीरे काम करने से सब हो जाएगा। समझी न, दरबार में इस पर गर्मागर्मी है कि अहमद की नीयत खराब है। कहीं ऐसा न हो कि मुझी को सुलतान इस काम के लिए भेजें।
- फिरोज़ा, मैं हिंदुस्तान नहीं जाना चाहता। मेरी एक छोटी बहन थी, वह वहाँ है ? क्या दुख उसने पाया ? मरी या जीती है, इन कई बरसों से मैंने इसे जानने की चेष्टा भी नहीं की और भी...... मैं हिंदू है, फिरोजा आज तक अपनी आकांक्षा में ! भूला हुआ, अपने आराम में मस्त, अपनी उन्नति में विस्मृत, गजनी में बैठा हुआ हिंदुस्तान को, अपनी जन्मभूमि को और उसके दुख-दर्द को भूल गया हूँ। सुलतान महमूद के लूटों की गिनती करना, उस रक्तरंजित धन की तालिका बनाना, हिंदुस्तान के ही शोषण के लिए सुलतान को नई-नई तरकीबें बताना, यही तो मेरा काम था, आज मेरी इतनी प्रतिष्ठा है दूर रहकर मैं वहाँ कुछ कर सकता था पर हिंदुस्तान कहीं मुझे जाना पड़ा उसकी गोद में फिर रहना पड़ा तो मैं क्या करूँगा! फिरोजा, मैं वहाँ जाकर हो जाऊँगा। चिरनिर्वासित, विस्मृत अपराधी इरावती मेरी बहन। आह, मैं उसे क्या मुँह दिखलाऊँगा। वह कितने कष्टों में जीती होगी। और मर गई हो तो.... फिरोज़ा! अहमद से कहना, मेरी मित्रता के नाते मुझे इस दुख से बचा ले।
-मैं जाऊँगी और इरावती को खोज निकालूँगी - राजा साहब! आपके हृदय में इतनी टीस है, आज तक मैं न जानती थी। मुझे यही मालूम था कि अनेक अन्य तुर्क
सरदारों के समान आप भी रंगरलियों में समय बिता रहे हैं, किंतु बरफ से ढकी हुई चोटियों के नीचे भी ज्वालामुखी होता है।
-तो जाओ फिरोजा ! मुझे बचाने के लिए, उस भयानक आग से, जिससे मेरा हृदय जल उठता है, मेरी रक्षा करो! कहते हुए राजा तिलक उसी जगह बैठ गए। फिरोजा खड़ी थी। धीरे-धीरे राजा के मुख पर एक स्निग्धता आ चली। अब अंधकार हो गजनी के लहरों पर से शीतल पवन उन झाड़ियों में भरने लगा था। सामने ही राजा साहब का महल था उसका शुभ्र गुंबद उस अंधकार में अभी अपनी उज्ज्वलता से सिर ऊँचा किए था। तिलक ने कहा- फीरोजा, जाने के पहले अपना वह गाना सुनाती जाओ।
फिरोजा गाने लगी। उसके गीत की ध्वनि थी- मैं जलती हुई दीप शिखा हूँ और तुम हृदय रंजन प्रभात हो! जब तक देखती नहीं, जला करती हूँ और जब तुम्हें देख लेती हूँ, तभी मेरे अस्तित्व का अंत हो जाता है- मेरे प्रियतम !- संध्या की अँधेरी झाड़ियों में गीत की गुंजार घूमने लगी।
एक बार उसे फिर देख पाता; पर यह होने का नहीं। निष्ठुर नियति! उसकी पवित्रता पंकिल हो गई होगी। उसकी उज्ज्वलता पर संसार के काले हाथों ने अपनी छाप लगा दी होगी। तब उससे भेंट करके क्या करूँगा ? क्या करूँगा अपने कल्पना के स्वर्ण मंदिर का खंडहर देखकर !- कहते-कहते बलराज ने अपने बलिष्ठ पंजों को पत्थरों से जकड़े हुए मंदिर के प्राचीर पर दे मारा। वह शब्द एक क्षण में विलीन हो गया। युवक ने आरक्त आँखों से उस विशाल मंदिर को देखा और वह पागल- सा उठ खड़ा हुआ। परिक्रमा के ऊँचे-ऊँचे खंभों से धक्के खाता हुआ घूमने लगा।
गर्भगृह के द्वारपालों पर उसकी दृष्टि पड़ी। वे तेल से चुपड़े हुए काले-काले दूत अपने भीषण त्रिशूल से जैसे युवक की ओर संकेत कर रहे थे। वह ठिठक गया। सामने देवगृह के समीप घृत का अखंड दीप जल रहा था। केसर, कस्तूरी और अगरु से मिश्रित की दिव्य सुगंध की झकोर रह-रहकर भीतर से आ रही थी। विद्रोही हृदय प्रणत होना नहीं चाहता था, परंतु सिर सम्मान से झुक ही गया।
-देव! मैंने अपने जीवन में जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया है। मैं किसके लिए क्षमा माँगूँ ? गजनी के सुलतान की नौकरी, वह मेरे वश की नहीं; किंतु मैं माँगता हूँ..... एक बार उस अपनी प्रेम-प्रतिमा का दर्शन! कृपा करो। मुझे बचा लो।
प्रार्थना करके युवक ने सिर उठाया ही था कि उसे किसी को अपने पास से खिसकने का संदेह हुआ। वह घूमकर देखने लगा। एक स्त्री कौशेय वसन पहने हाथ में फूलों से सजी डाली लिए चली जा रही थी। युवक पीछे-पीछे चला। परिक्रमा में एक स्थान पर पहुँचकर उसने संदिग्ध स्वर से पुकारा- इरावती ! वह स्त्री घूमकर खड़ी हो गई। बलराज अपने दोनों हाथ पसारकर उसे आलिंगन करने के लिए दौड़ा। इरावती ने कहा- ठहरी बलराज ठिठककर उसकी गंभीर मुखाकृति को देखने लगा। उसने पूछा- क्यों इरा ! क्या तुम मेरी वाग्दत्ता पत्नी नहीं हो ? क्या हम लोगों का वह्नि-वेदी के सामने परिणय नहीं होने वाला था ? क्या
- हाँ, होने वाला था किंतु हुआ नहीं, और बलराज ! तुम मेरी रक्षा नहीं कर सके। मैं आततायी के हाथ से कलंकित की गई। फिर तुम मुझे पत्नी रूप में कैसे बनोगे ? तुम वीर हो पुरुष हो तुम्हारे पुरुषार्थ के लिए बहुत-सी महत्त्वाकांक्षाएँ हैं। उन्हें खोज लो, मुझे भगवान् की शरण में छोड़ दो। मेरा जीवन, अनुताप की ज्वाला से झुलसा हुआ मेरा मन, अब स्नेह के योग्य नहीं।
-प्रेम की, पवित्रता की, परिभाषा अलग है इरा! मैं तुमको प्यार करता हूँ। तुम्हारी पवित्रता से मेरे मन का अधिक संबंध नहीं भी हो सकता है। चलो, हम ..... और कुछ भी हो मेरे प्रेम की बनि तुम्हारी पवित्रता को अधिक उज्वल कर देगी।
-भाग चलूँ, क्यों ? सो नहीं हो सकता। मैं क्रीत दासी हूँ। म्लेच्छों ने मुझे मुलतान की लूट में पकड़ लिया। मैं उनकी कठोरता में जीवित रहकर बराबर उनका विरोध ही करती रही। नित्य कोड़े लगते। बाँधकर मैं लटकाई जाती। फिर भी मैं अपने हठ से न डिगी। एक दिन कन्नौज के चतुष्पथ पर घोड़ों के साथ ही बेचने के लिए उन आततायियों ने मुझे भी खड़ा किया। मैं बिकी सौ दिरम पर, काशी के ही एक महाजन ने मुझे दासी बना लिया। बलराज ! तुमने न सुना होगा, कि मैं किन नियमों के साथ बिकी है। मैंने लिखकर स्वीकार किया है, इस घर का कुत्सित-से- कुत्सित कर्म करूँगी और कभी विद्रोह न करूँगी न कभी भागने की चेष्टा करूँगी; न किसी के कहने से अपने स्वामी का अहित सोचूँगी। यदि मैं आत्महत्या भी कर डालूँ, तो मेरे स्वामी या उनके कुटुंब पर कोई दोष न लगा सकेगा। वे गंगा स्नान किए से पवित्र हैं। मेरे संबंध में वे सदा ही शुद्ध और निष्पाप हैं। मेरे शरीर पर उनका आजीवन अधिकार रहेगा। वे मेरे नियम विरुद्ध आचरण पर जब चाहें राजपथ पर मेरे बालों को पकड़कर मुझे घसीट सकते हैं। मुझे दंड दे सकते हैं। मैं तो मर चुकी हूँ। मेरा शरीर पाँच सौ दिरम पर जीकर जब तक सहेगा, खटेगा। वे चाहें तो मुझे कौड़ी के मोल भी किसी दूसरे के हाथ बेच सकते हैं। समझे। सिर पर तृण रखकर मैंने स्वयं अपने को बेचने में स्वीकृति दी है। उस सत्य को कैसे तोड़ दू?
बलराज ने लाल होकर कहा- इरावती, यह असत्य है, सत्य नहीं। पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं ? मैं यह सोच भी नहीं सकता। यह पाखंड तुर्की घोड़ों के व्यापारियों ने फैलाया है। तुमने अनजान में जो प्रतिज्ञा कर ली है, वह ऐसा सत्य नहीं कि पालन किया जाए। तुम नहीं जानती हो कि तुमको खोजने के लिए ही मैंने यवनों की सेवा की।
-क्षमा करो मैं तुम्हारा तर्क नहीं समझ सकी। मेरी स्वामिनी का रथ दूर, चला गया होगा, तो मुझे बातें सुननी पड़ेंगी, क्योंकि आजकल मेरे स्वामी नगर से दूर स्वास्थ्य के लिए उपवन में रहते हैं। स्वामिनी देव-दर्शन के लिए आई थीं। -तब मेरा इतना परिश्रम व्यर्थ हुआ ! फिरोजा ने व्यर्थ ही आशा दी थी। मैं इतने
दिनों भटकता फिरा । इरावती! मुझ पर दया करो।
-फिरोजा कौन ?- फिर सहसा रुककर इरावती ने कहा- क्या करूँ ! यदि मैं वैसा करती, तो मुझे इस जीवन की सबसे बड़ी प्रसन्नता मिलती; किंतु वह मेरे भाग्य में है कि नहीं, इसे भगवान ही जानते होंगे ? मुझे अब जाने दो। बलराज इस उत्तर से खिन्न और चकराया हुआ काठ के किवाड़ की तरह इरावती के सामने से अलग होकर मंदिर के प्राचीर से लग गया। इरावती चली गई। बलराज कुछ समय तक स्तब्ध और शून्य-सा वहीं खड़ा रहा। फिर सहसा जिस ओर इरावती गई थी, उसी ओर चल पड़ा।
युवक बलराज कई दिन तक पागलों-सा धनदत्त के उपवन से नगर तक चक्कर लगाता रहा। भूख-प्यास भूलकर वह इरावती को एक बार फिर देखने के लिए विकल था; किंतु वह सफल न हो सका। आज उसने निश्चय किया था कि वह काशी छोड़कर चला जाएगा। वह जीवन से हताश होकर काशी से जाने वाले पथ पर चलने लगा। उसकी पहाड़ के ढोके सी काया, जिसमें असुर-सा बल होने का अनुमान करते, निर्जीव-सी हो रही थी। अनाहार से उसका मुख विवर्ण था।
वह सोच रहा था उस दिन विश्वनाथ के मंदिर में न जाकर मैंने आत्महत्या क्यों - न कर ली। वह अपनी उधेड़-बुन में चल रहा था। न जाने कब तक चलता रहा। वह चौंक उठा- जब किसी के डाँटने का शब्द सुनाई पड़ा देखकर नहीं चलता! बलराज ने चौंककर देखा, अश्वारोहियों की लंबी पंक्ति, जिसमें अधिकतर अपने घोड़ों को पकड़े हुए पैदल ही चल रहे थे। वे सब तुर्क थे। घोड़ों के व्यापारी से जान पड़ते थे। गजनी के प्रसिद्ध महमूद के आक्रमणों का अंत हो चुका था। मसऊद सिंहासन पर था। पंजाब तो गजनी के सेनापति नियाल्तगीन के शासन में था। मध्य- प्रदेश में भी तुर्क व्यापारी अधिकतर व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए प्रयत्न कर रहे थे। वह राह छोड़कर हट गया। अश्वारोही ने पूछा- बनारस कितनी दूर होगा ?
बलराज ने कहा- मुझे नहीं मालूम।
- तुम अभी उधर से चले आ रहे हो और कहते हो, नहीं मालूम ! ठीक-ठीक बताओ, नहीं तो.....!
- नहीं तो क्या ? मैं तुम्हारा नौकर हूँ। कहकर वह आगे बढ़ने लगा। अकस्मात् पहले अश्वारोही ने कहा- पकड़ लो इसको !
-कौन! नियाल्तगीन! सहसा बलराज चिल्ला उठा। - अच्छा, यह तुम्हीं हो बलराज ! यह तुम्हारा क्या हाल है, क्या सुलतान की सरकार में अब तुम काम नहीं करते हो ?
-नहीं, सुलतान मसऊद का मुझ पर विश्वास नहीं है। मैं ऐसा काम नहीं करता,
जिसमें संदेह मेरी परीक्षा लेता रहे; किंतु इधर तुम लोग क्यों ?
-सुना है, बनारस एक सुंदर और धनी नगर है। और .......
-और क्या ?
-कुछ नहीं, देखने चला आया हूँ। काजी नहीं चाहता कि कन्नौज के पूरब भी कुछ हाथ-पाँव बढ़ाया जाए। तुम चलो न मेरे साथ। मैं तुम्हारी तलवार की कीमत जानता हूँ। बहादुर लोग इस तरह नहीं रह सकते। तुम अभी तक हिंदू बने हो। पुरानी लकीर पीटने वाले, जगह-जगह झुकने वाले, सबसे दबते हुए, बनते हुए, कतराकर चलने वाले हिंदू क्यों ? तुम्हारे पास बहुत-सा कूड़ा-कचरा इकट्ठा हो गया है, उनका पुरानेपन का लोभ तुमको फेंकने नहीं देता ? मन में नयापन तथा दुनिया का
उल्लास नहीं आने पाता ? इतने दिन हम लोग साथ रहे, फिर भी.....
बलराज सोच रहा था, इरावती का वह सूखा व्यवहार। सीधा-सीधा उत्तर! क्रोध से वह अपना ओठ चबाने लगा। नियाल्तगीन बलराज को परख रहा था। उसने कहा- तुम कहाँ हो ? बात क्या है ? ऐसा बुझा हुआ मन क्यों ?
बलराज ने प्रकृतिस्थ होकर कहा-कहीं तो नहीं। अब मुझे छुट्टी दो, मैं जाऊँ। तुम्हारा बनारस देखने का मन है- इस पर तो मुझे विश्वास नहीं होता, तो भी मुझे इससे क्या ? जो चाहो करो। संसार भर में किसी पर दया करने की आवश्यकता नहीं लूटो, काटो, मारो। जाओ, नियाल्तगीन।
नियाल्तगीन ने हँसकर कहा- पागल तो नहीं हो। इन थोड़े-से आदमियों से भला क्या हो सकता है। मैं तो एक बहाने से इधर आया हूँ। फिरोजा का बनारसी जरी के कपड़ों का.....।
क्या फिरोजा भी तुम्हारे साथ है ?
- चलो, पड़ाव पर सब आप ही मालूम हो जाएगा!- कहकर नियाल्तगीन ने
संकेत किया। बलराज के मन में न जाने कैसी प्रसन्नता उमड़ी। वह एक तुर्की घोड़े
पर सवार हो गया।
दोनों और जवाहरात तरी कपड़ों, बर्तन तथा सुगंधित द्रव्यों की सजी हुई दुकानों से, देश-विदेश के व्यापारियों की भीड़ और बीच-बीच में एक घोड़े के रथों से, बनारस की पत्थर से बनी हुई चौड़ी गलियाँ अपने ढंग की निराली दिखती थीं। प्राचीरों से घिरा हुआ नगर का प्रधान भाग त्रिलोचन से लेकर राजघाट तक विस्तृत था। तोरणों पर गांगेय देव के सैनिकों का जमाव था। कन्नौज के प्रतिहार सम्राट् से काशी छीन ली गई थी। उस पर शासन करती थी। ध्यान से देखने पर यह तो प्रकट हो जाता था कि नागरिकों में अव्यवस्था थी। फिर भी ऊपरी काम-काज, क्रय-विक्रय, यात्रियों का आवागमन चल रहा था।
फिरोजा कमख्वाब देख रही थी और नियाल्तगीन मणिमुक्ताओं की ढेरी से अपने लिए अच्छे-अच्छे नग चुन रहा था। पास ही दोनों दुकानें थीं। बलराज बीच में ही खड़ा था। अन्यमनस्क फिरोजा ने कई थान छाँट लिए थे। उसने कहा- बलराज ! देखो तो, इन्हें तुम कैसा समझते हो, हैं न अच्छे ? उधर से नियाल्तगीन ने
पूछा- कपड़े देख चुकी हो, तो इधर आओ। इन्हें भी देख लो ! फिरोज़ा उधर जाने लगी थी कि दुकानदार ने कहा-लेना न देना, झूठ-मूठ तंग करना। कभी देखा तो नहीं। कंगालों की तरह जैसे आँखों से देखकर ही खा जाएगी। फिरोजा घूमकर खड़ी हो गई। उसने पूछा-क्या बकते हो?- जा जा तुर्किस्तान के जंगलों में भेड़ चरा । इन कपड़ों का लेना तेरा काम नहीं।- सटी हुई दुकानों से जौहरी अभी कुछ बोलना ही चाहता था कि बलराज ने कहा-
-चुप रह, नहीं तो जीभ खींच लूँगा।
-ओहो! तुर्की गुलाम का दास, तू भी ...। अभी इतना ही कपड़े वाले के मुँह से निकला था कि नियाल्तगीन की तलवार उसके गले तक पहुँच गई। बाज़ार में हलचल मची। नियाल्तगीन के साथी इधर-उधर बिखरे ही थे। कुछ तो वहीं आ गए। औरों को समाचार मिल गया। झगड़ा बढ़ने लगा। नियाल्तगीन को कुछ लोगों ने घेर लिया था; किंतु तुर्की ने उसे छीन लेना चाहा। राजकीय सैनिक पहुँच गए। नियाल्तगीन को यह मालूम हो गया कि पड़ाव पर समाचार पहुँच गया है। उसने निर्भीकता से अपनी तलवार घुमाते हुए कहा- अच्छा होता कि झगड़ा यहीं तक रहता, नहीं तो हम लोग तुर्क हैं।
तुर्कों का आतंक उत्तरी भारत में फैल चुका था। क्षण-भर के लिए सन्नाटा तो हुआ, परंतु वणिक के प्रतिरोध के लिए नागरिकों का रोष उबल रहा था। राजकीय सैनिकों का सहयोग मिलते ही युद्ध आरंभ हो गया, अब और भी तुर्क आ पहुँचे थे। नियाल्तगीन लगा। उसने तुर्की में संकेत किया। बनारस का राजपथ तुर्कों की तलवार से पहली बार आलोकित हो उठा।
नियाल्तगीन के साथी संगठित हो गए थे। वे केवल युद्ध और आत्मरक्षा ही नहीं कर रहे थे, बहुमूल्य पदार्थों की लूट भी करने लगे। बलराज स्तब्ध था। वह जैसे एक स्वप्न देख रहा था। अकस्मात् उसके कानों में एक परिचित स्वर सुनाई पड़ा। उसने घूमकर देखा जौहरी के गले पर तलवार पड़ा ही चाहती थी और इरावती 'इन्हें छोड़ दो, न मारो' कहती हुई तलवार के सामने आ गई बलराज ने कहा- ठहरो, नियाल्तगीन दूसरे ही क्षण नियाल्तगीन की कलाई बलराज की मुट्ठी में थी। नियाल्तगीन ने कहा- धोखेबाज़ काफ़िर, यह क्या? - कई तुर्क पास आ गए थे ! फिरोजा का भी मुख तमतमा गया था। बलराज ने सबल होने पर भी
बड़ी दीनता से कहा-फिरोता यही इरावती है। फिरोता हँसने लगी। इरावती को पकड़कर उसने कहा- नियाल्तगीन ! बलराज को इसके साथ लेकर मैं चलती हूँ, तुम आना और इस जौहरी से तुम्हारा नुकसान न हो, तो न मारो देखो, बहुत-से घुड़सवार आ रहे हैं। हम सबों का चलना ही अच्छा है। नियातगीन ने परिस्थिति एक क्षण में ही समझ लो उसने जौहरी से पूछा -
तुम्हारे घर में दूसरी ओर से बाहर जाया जा सकता है ? - हाँ ! - कँपे कंठ से उत्तर मिला।
-अच्छा चलो, तुम्हारी जान बच रही है। मैं इरावती को ले जाता हूँ।- कहकर नियाल्तगीन ने एक तुर्क के कान में कुछ कहा! और बलराज को आगे चलने का संकेत करके इरावती और फिरोज़ा के पीछे धनदत्त के घर में घुसा। इधर तुर्क एकत्र होकर प्रत्यावर्तन कर रहे थे। नगर की राजकीय सेना पास आ रही थी।
चंद्रभागा के तट पर शिविरों की एक श्रेणी उसके समीप ही बने वृक्षों के
झुरमुट में इरावती और फिरोजा बैठी हुई सायंकालीन गंभीरता की छाया में एक-
दूसरे का मुँह देख रही हैं। फिरोजा ने कहा-
-बलराज को तुम प्यार करती हो ?
-मैं नहीं जानती - एक आकस्मिक उत्तर मिला!
-और वह तो तुम्हारे ही लिए गजनी से हिंदुस्तान चला आया। -तो क्यों आने दिया, वहीं रोक रखतीं ।
- तुमको क्या हो गया है ?
-मैं-मैं नहीं रही; मैं दासी हूँ; कुछ धातु के टुकड़ों पर बिकी हुई हाड़-मांस का समूह, जिसके भीतर एक सूखा हृदय पिंड है।
- इरा! वह मर जाएगा- पागल हो जाएगा।
-और मैं क्या हो जाऊँ, फिरोजा ?
- अच्छा होता, तुम भी मर जातीं! तीखेपन से फिरोज़ा ने कहा। इरावती चौक उठी। कहा- बलराज ने वह भी न होने दिया। उस दिन नियाल्तगीन की तलवार ने यही कर दिया होता; किंतु मनुष्य बड़ा ही स्वार्थी है।
अपने सुख की आशा में वह कितनों को दुखी बनाया करता है। अपनी साथ पूरी करने में दूसरों की आवश्यकता ठुकरा दी जाती है। तुम ठीक कह रही हो फिरोज़ा, मुझे.
-ठहरो, इरा! तुमने मन को कड़वा बनाकर मेरी बात सुनी है। उतनी ही तेज़ी
से उसे बाहर कर देना चाहती हो। -मेरे दुखी होने पर जो मेरे साथ रोने आता है, उसे मैं अपना मित्र नहीं जान सकती, फिरोज़ा। मैं तो देखूँगी कि वह मेरे दुख को कितना कम कर सका है। मुझे दुख सहने के लिए जो छोड़ जाता है, केवल अपने अभिमान और आकांक्षा की तुष्टि के लिए। मेरे दुख में हाथ बँटाने का जिसका साहस नहीं, जो मेरी परिस्थिति में साथी नहीं बन सकता, जो पहले अमीर बनना चाहता है फिर अपने प्रेम का दान करना चाहता है, वह मुझसे हृदय माँगे, इससे बढ़कर धृष्टता और क्या होगी ?
- मैं तुम्हारी बहुत-सी बातें समझ नहीं सकी, लेकिन मैं इतना तो कहूँगी कि
दुखों ने तुम्हारे जीवन की कोमलता छीन ली है।
- फिरोजा .... मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहती। तुमने मेरे प्राण बचाए हैं सही, किंतु हृदय नहीं बचा सकतीं। उसे अपनी खोज-खबर आप ही लेनी पड़ेगी। तुम चाहे जो मुझे कह लो मैं तो समझती हूँ कि मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कभी पूर्ण नहीं हो सकता। पर उसे अपनी आँखों से तो नहीं गिरना चाहिए।
फिरोज़ा ने संदेह से पीछे की ओर देखा। बलराज वृक्ष की आड़ से निकल आया। उसने कहा- फिरोज़ा, मैं जब गजनी के किनारे मरना चाहता था, भूलकर रहा था ? अच्छा, जाता हूँ। तो क्या
इरावती सोच रही थी, अब भी कुछ बोलू-
फिरोजा सोच रही थी, दोनों को मरने से बचाकर क्या सचमुच मैंने कोई बुरा
काम किया ?
बलराज की ओर किसी ने न देखा। वह चला गया।
रावी के किनारे एक सुंदर महल में अहमद नियाल्तगीन पंजाब के सेनानी का आवास है। उस महल के चारों ओर वृक्षों की दूर तक फैली हुई हरियाली है, जिसमें शिविरों की श्रेणी में तुर्क सैनिकों का निवास है।
वसंत की चाँदनी रात अपनी मतवाली उज्ज्वलता में महल के मीनारों और गुंबदों तथा वृक्षों की छाया में लड़खड़ा रही है, अब जैसे सोना चाहती हो। चंद्रमा पश्चिम में धीरे-धीरे झुक रहा था। रावी की ओर एक संगमरमर की दालान में खाली सेज बिछी थी। जरी के परदे ऊपर की ओर बँधे थे। दालान की सीढ़ी पर बैठी हुई रावी का प्रवाह देखते-देखते सोने लगी थी उस महल की जैसे सजावट गुलाबी पत्थर की अचल प्रतिमा हो।
शयन कक्ष की सेवा का भार आज उसी पर था। वह अहमद के आगमन की प्रतीक्षा करते-करते सो गई थी। अहमद इन दिनों गजनी से मिले हुए समाचार के कारण अधिक व्यस्त था। सुलतान के रोष का समाचार उसे मिल चुका था। वह फिरोजा से छिपाकर, अपने अंतरंग साथियों से, जिन पर उसे विश्वास था, निस्तब्ध रात्रि में मंत्रणा किया करता पंजाब का स्वतंत्र शासक बनने की अभिलाषा उसके मन में जग गई थी, फिरोज़ा ने उसे मना किया था, किंतु एक साधारण तुर्क दासी के विचार राजकीय कामों में कितने मूल्य के हैं, इसे वह अपनी महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से परखता था। फिरोजा कुछ तो रूठी और कुछ उसकी तबीयत भी अच्छी न थी। वह बंद कमरे में जाकर सो रही। अनेक दासियों के रहते भी आज इरावती को ही वहाँ ठहरने के लिए उसने कह दिया था। अहमद सीढ़ियों से चढ़कर दालान के पास आया। उसने देखा एक वेदना-विमंडित सुप्त सौंदर्य! वह और भी समीप आया। गुंबद के से चंद्रमा की किरणें ठीक इरावती के मुख पर पड़ रही थीं। अहमद नेवारुशीविलसित नेत्रों से देखा, उस रूपमाधुरी को, जिसमें स्वाभाविकता थी, बनावट नहीं। तरावट थी, प्रमाद की गर्मी नहीं। एक बार सशंक दृष्टि से उसने चारों और देखा फिर इरावती का हाथ पकड़कर हिलाया। वह चौंक उठी। उसने देखा- सामने अहमद! इरावती खड़ी होकर अपने वस्त्र सँभालने लगी। अहमद ने संकोच- भरी ढिठाई से कहा-
- तुम यहाँ क्यों सो रही हो, इरा ? थक गई थी। कहिए, क्या लाऊँ ?
-थोड़ी शीराजी कहते हुए वह पलंग पर जाकर बैठ गया और इरावती का - स्फटिक पात्र में शीरा जी उड़ेलना देखने लगा। इरा ने जब पात्र भरकर अहमद को दिया, तो अहमद ने सतृष्ण नेत्रों से उसकी ओर देखकर पूछा- फिरोजा कहाँ है?
-सिर में दर्द है, भीतर सो रही है।
अहमद की आँखों में पशुता नाच उठी। शरीर में एक सनसनी का अनुभव करते हुए उसने इरावती का हाथ पकड़कर कहा- बैठो न, इरा! तुम थक गई हो।
-आप शर्बत लीजिए। मैं जाकर फिरोजा को जगा दूँ। - फिरोजा । फिरोज़ा के हाथ बिक गया हूँ क्या, इरावती ! तुम- आह !
इरावती हाथ छुड़ाकर हटने वाली ही थी कि सामने फिरोजा खड़ी थी! उसकी आँखों में तीव्र ज्वाला थी। उसने कहा- मैं बिकी हूँ, अहमद ! तुम भला मेरे हाथ क्यों बिकने लगे ? लेकिन तुमको मालूम है कि तुमने अभी राजतिलक को मेरा दाम नहीं चुकाया; इसलिए मैं जाती हूँ।
अहमद हत बुद्धि। निष्प्रभ और फिरोजा चली इरावती ने गिड़गिड़ाकर कहा- बहन, मुझे भी न लेती चलोगी.......?
फिरोजा ने घूमकर एक बार स्थिर दृष्टि से इरावती की ओर देखा और कहा-
तो फिर चलो।
दोनों हाथ पकड़े सीढ़ी से उत्तर गई।
बहुत दिनों तक विदेश में इधर-उधर भटकने पर बलराज जब से लौट आया है, तब से चंद्रभागा तट के जाटों में एक नई लहर आ गई है। बलराज ने अपने सजातीय लोगों को पराधीनता से मुक्त होने का संदेश सुनाकर उन्हें सुलतान सरकार का अबाध्य दिया है। उदंड जाटों को अपने वश में रखना, उन पर सदा फ़ौजी शासन करना, सुलतान के कर्मचारियों के लिए भी बड़ा कठिन हो रहा था।
इधर फिरोज़ा के जाते ही अहमद अपनी कोमल वृत्तियों को भी खो बैठा। एक और उसके पास मसऊद के रोष के समाचार आते थे, दूसरी ओर वह जाटों की हलचल से खज़ाना भी नहीं भेज सकता था। वह झुंझला गया। दिखावे में तो अहमद ने जाटों को एक बार ही नष्ट करने का निश्चय कर लिया, और अपनी दृढ़ सेना के साथ वह जाटों को घेरे में डालते हुए बढ़ने लगा; किंतु उसके हृदय में एक दूसरी ही बात थी। उसे मालूम हो गया था कि गजनी की सेना तिलक के साथ आ रही है; उसकी कल्पना का साम्राज्य छिन्न-भिन्न कर देने के लिए उसने अंतिम प्रयत्न करने का निश्चय किया। अंतरंग साथियों की सम्मति हुई कि यदि विद्रोही जाटों को इस समय मिला लिया जाए, तो गजनी से पंजाब आज ही अलग हो सकता है। इस चढ़ाई में दोनों मतलब थे।
घने जंगल का आरंभ था । वृक्षों के हरे अंचल की छाया में थकी हुई दो युवतियाँ उनकी जड़ों पर सिर धरे हुए लेटी थीं। पथरीले टीलों पर पड़ती हुई घोड़ों की टापों के शब्द ने उन्हें चौंका दिया। वे अभी उठकर बैठ भी नहीं पाई थीं कि उनके सामने अश्वारोहियों का एक झुंड आ गया। भयानक भालों की नोक सीधी किए हुए स्वास्थ्य के तरुण तेज से उद्दीप्त जाट-युवकों का वह वीर दल था। स्त्रियों को देखते ही उनके सरदार ने कहा- "माँ, तुम लोग कहाँ जाओगी ?"
अब फिरोज़ा और इरावती सामने खड़ी हो गईं। सरदार ने घोड़े पर से उतरते हुए
पूछा- "फिरोज़ा, यह तुम हो बहन !"
"हाँ भाई बलराज ! मैं हूँ और यह है इरावती!" पूरी बात जैसे न सुनते हुए बलराज ने कहा- फिरोज़ा, अहमद से युद्ध होगा। इस जंगल को पार कर लेने पर तुर्क सेना जाटों का नाश कर देगी, इसलिए यहीं उन्हें रोकना होगा। तुम लोग इस समय ?"
-"जहाँ कहो, बलराज अहमद की छाया से तो मुझे भी बचना है।" फिरोज़ा
ने अधीर होकर कहा।
- डरो मत फिरोज़ा, यह हिंदुस्तान है, और यह हम हिंदुओं का धर्म-युद्ध है। गुलाम बनने का भय नहीं।- बलराज अभी यह कह ही रहा था कि वह चौंककर पीछे देखता हुआ बोल उठा- अच्छा, वे लोग आ ही गए। समय नहीं है। बलराज दूसरे ही क्षण में अपने घोड़े की पीठ पर था। अहमद की सेना सामने आ गई। बलराज को देखते ही उसने चिल्लाकर कहा- बलराज ! यह तुम्हीं हो।
-हाँ, अहमद ।
- तो हम लोग दोस्त भी बन सकते हैं। अभी समय है- कहते-कहते सहसा उसकी दृष्टि फिरोज़ा और इरावती पर पड़ी। उसने समस्त व्यवस्था भूलकर, तुरंत ललकारा - पकड़ लो इन औरतों को ! उसी समय बलराज का भाला हिल उठा। युद्ध का आरंभ था।
जाटों की विजय के साथ युद्ध का अंत होने ही वाला था कि एक नया परिवर्तन हुआ। दूसरी ओर से तुर्क सेना जाटों की पीठ पर थी। घायल बलराज का भीषण भाला अहमद की छाती में पार हो रहा था। निराश जाटों की रण-प्रतिज्ञा अपनी पूर्ति करा रही थी। मरते हुए अहमद ने देखा कि गजनी की सेना के साथ तिलक सामने खड़े थे। सब के अस्त्र तो रुक गए, परंतु अहमद के प्राण न रुके। फिरोज़ा उसके शव पर झुकी हुई रो रही थी और इरावती मूर्छित हो रहे बलराज का सिर अपनी गोद में लिए थी। तिलक ने विस्मित होकर यह दृश्य देखा।
बलराज ने जल का संकेत किया। इरावती के हाथों में तिलक ने जल का पात्र दिया। जल पीते ही बलराज ने आँखें खोलकर कहा-इरावती, अब मैं न मरूँगा?
तिलक ने आश्चर्य से पूछा- इरावती ? फिरोजा ने रोते हुए कहा- हाँ राजा साहब, इरावती ?
मेरी दुखिया इरावती। मुझे क्षमा कर, मैं तुझे भूल गया था। तिलक ने विनीत
शब्दों में कहा। - भाई! इरावती आगे कुछ न कह सकी, उसका गला भर आया था। उसने तिलक के पैर पकड़ लिए।
बलराज जाटों का सरदार है, इरावती रानी । चनाब का वह प्रांत इरावती की करुणा से हरा-भरा हो रहा है; किंतु फिरोजा की प्रसन्नता की वहीं समाधि बन गई- और वहीं वह झाड़ देती, फूल चढ़ाती और दीप जलाती रही। उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही।
܀܀܀

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