शिवानी का वास्तविक नाम गौरा पंत था। इनका जन्म राजकोट, गुजरात में 17 अक्तूबर सन् 1923 में हुआ था। शांतिनिकेतन और कोलकाता विश्वविद्यालय में इन्होंने शिक्षा पाई। आपकी कहानियाँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। शिवानी की मृत्यु 79 वर्ष की आयु में 21 मार्च,
सन् 2003 में हुई।
शिवानी ने कहानियों, उपन्यास और संस्मरण लिखे हैं। इनकी उल्लेखनीय
रचनाएँ हैं- 'विष कन्या', 'करिए छिमा', 'लाल हवेली', 'अपराधिनी', 'पुष्पहार', 'चार दिन' कथा संग्रह चौदह फेरे', 'कैजा', 'भैरवी', 'कृष्णकली',
'मायापुरी' - उपन्यास।
'लाल हवेली', 'करिए छिमा', 'के', 'चीलगाड़ी', 'मधुयामिनी' इनकी लोकप्रिय कहानियाँ हैं।
इन्होंने अपनी कृतियों में सामाजिक रूढ़ियों तथा आडंबरों पर करारा व्यंग्य भी किया है।
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4. सती (शिवानी)
गाड़ी ठसाठस भरी थी, स्टेशन पर तीर्थयात्रियों का उफ़ान सा उमड़ रहा था। एक माघ की पुण्यतिथि में अर्ध कुंभ का मेला, उस पर प्रयाग स्टेशन। मैंने रिजर्वेशन स्लिप में अपना नाम ढूँढ़ा और बड़ी तसल्ली से अन्य तीन नामों की सूची देखी। चलिए, तीनों महिलाएँ ही थीं, पुरुष सहयात्रियों के नासिका-गर्जन से तो छुट्टी मिली दो महिलाएँ आ चुकी थीं। एक, जैसा कि मैंने नाम से ही अनुमान लगा लिया था, महाराष्ट्री थीं और दूसरी पंजाबी तीसरी में थी और चौथी अभी आई नहीं थी। मैं एक ही दिन के लिए बाहर जा रही थी, इसी से एक छोटा बटुआ ही साथ में था। आसपास बिखरे, दोनों महिलाओं के भारी-भरकम सूटकेस, स्टील के बक्स और मेरुपर्वत से ऊँचे ठसे कसे होल्डाल देखकर मैंने अपने को बहुत हलका-फुलका अनुभव वैसे भी मैं सोचती हूँ, बक्स-होल्डालहीन यात्रा में जो सुख है, वह अन्य किसी में नहीं। चटपट चढ़े और खटपट उतर गए। न कुलियों की हथेली पर धरे द्रव्य को अवज्ञापूर्ण दृष्टि से देखकर 'ये क्या दे रही हैं साहब' कहने का भय, न सहयात्रियों के उपालंभ की चिंता ! मेरे साथ की महाराष्ट्री महिला ने अपने वृहदाकार स्टील के बक्स एक के ऊपर एक चुनकर पिरामिड-से सजा दिए थे। लगता था वे प्रत्येक वस्तु के लिए स्थान और प्रत्येक स्थान के लिए वस्तु की उपादेयता में विश्वास रखती थीं। वे स्वयं, बड़ी शालीनता से लेटकर एक सीध में दो तकिये लगाए, एक मराठी पत्रिका पढ़ने में तल्लीन थीं। दूसरी पंजाबी महिला के पास एक सूटकेस, टोकरी और बिस्तरा ही था, पर तीनों बेतरतीबी से बिखरे पड़े थे। उनका एक सुराहीदान, जिसकी एक टाँग अधिकाँश सुराहीदानों की भाँति कुछ छोटी थी, बार-बार लुढ़ककर उनको परेशान किए जा रहा था। वे बेचारी चश्मा उतारकर रखतीं, हाथ की जासूसी अंग्रेजी पुस्तक, जिसे पढ़ने में उन्हें पर्याप्त रस आ रहा था, आँधी कर बर्थ पर टिकात, झुंझलाकर सुराहीदान ठिकाने से लगाकर जैसे ही हाथ की पुस्तक में रस की डुबकी लगातीं कि सुराहीदान फिर लुढ़क जाता। मुझे उनकी उलझन देखकर बड़ी हँसी आ रही थी। वैसे मैं उनकी परेशानी काफ़ी हद तक दूर कर सकती थी, क्योंकि सुराहीदान मेरे पास ही धरा था। मैं उसकी लँगड़ी टाँग को अपनी वर्ष से टिकाकर लुड़कने से रोक सकती थी, पर सुराही को ऐसी बेडुकी काठ की सवारी में साथ लेकर चलने वालों से मुझे कभी सहानुभूति नहीं रहती। पंजाबी महिला संभवतः किसी मीटिंग में भाग लेने जा रही थीं, क्योंकि उनके साथ एक मोटी-सी फ़ाइल भी चल रही थी, जिसे खोल वे बीच-बीच में हिल- हिलकर कुछ आँकड़ों को पहाड़ों की भाँति रटने लगतीं, और फिर बंद कर उपन्यास पढ़ने लगतीं। उनकी सलवार कमीज़, दुपट्टा, यहाँ तक कि रूमाल भी खद्दर का था और शायद उसी के संघर्ष से उनकी लाल नाक का सिरा और भी अबीरी लग रहा था। उनके चेहरे पर रोब था, किंतु लावण्य नहीं। रंग गोरा था, किंतु खाल में हाथ की बुनी खादी का सा ही खुरदरापन था। ठुड्डी पर एक बड़े-से तिल पर दो-तीन लंबे बाल लटक रहे थे, जिन्हें वे अँगुली में लपेटती छल्ले सा घुमा रही थी। या वे प्रौढ़ा कुमारी थीं, या फिर विधवा, क्योंकि चेहरे पर एक अजीब रीतापन था, जीवन के उल्लास की एक-आध रेखा मुझे ढूँढ़ने से भी नहीं मिली। जासूसी पुस्तक को थामने वाले उनके हाथों की बनावट मर्दानी और पकड़ मजबूत थी। ये वे हाथ नहीं हो मैं मन में सोच रही थी, जो बच्चों को मीठी लोरी की थपकनें देकर सुलाते हैं, पति की कमीज़ में बटन टाँकते हैं, या चिमटा सनसी पकड़ते हैं। ये वे हाथ नहीं हैं, जिनकी हस्तरेखाओं को उनकी कर्म रेखाएँ धूल कालिख की दरारों से मलिन कर देती हैं।
मेरा अनुमान ठीक था, स्वयं ही उन्होंने अपना परिचय दे दिया। वे पंजाब के विस्थापित स्त्रियों के लिए बनाए गए एक आश्रम की संचालिका थीं। हाल ही में विदेश से लौटी थीं और लखनऊ की किसी समाज कल्याण गोष्ठी में भाग लेने जा रही थीं। समाज सेविकाओं में उनका नाम अग्रणी था।
महाराष्ट्री महिला के परिचय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। उस स्वल्पभाषिणी सुंदरी प्रौढ़ा ने हम में से किसी को भी, मैत्री का हाथ बढ़ाकर प्रोत्साहित नहीं किया। हाथ की मराठी पत्रिका को पढ़ती वे कभी स्वयं ही मुसकराती जा रही थीं और कभी गहरी उदासी से गर्दन मोड़ ले रही थीं। स्पष्ट था कि किसी कुशल मराठी कथा- लेखक की सिद्ध कलम का जादू उन्हें कठपुतली-सा नचा रहा था। वे हमारे डिब्बे में होकर भी नहीं थीं। उनके गोरे रंग पर उनकी लाल शोलापुरी साड़ी लपटें सी मार रही थी। गोल परिपाटी से बाँधा गया जूड़ा, एड़ी-चुंबी केशराशि के मूलधन का परिचय दे रहा था। कानों में सात मोतियों के वर्तुलाकार कर्णफूल थे और गले में था- दुहरी लड़ का मंगलसूत्र, जिसे वे अभ्यासवश बार-बार दाँतों में दबा ले रही थीं। उनके सामान पर, संभवतः उनके पति के नाम का लेबल लगा था मेजर जनरल वनोलकर, और वे वास्तव में थीं भी मेजर जनरल की ही पत्नी होने के योग्य। पूरे चेहरे में, दोनों आँखें ही सबसे ज्वलंत आभूषण थीं। वे कुछ भी नहीं बोल रही थीं, पर वे बड़ी-बड़ी आँखें निरंतर हँसती-मुसकरातीं, परिचय देतीं, मज़ाक उड़ाती जा रही थीं। कभी वे मुझे देखतीं, कभी उस पंजाबी महिला को, पर आँखें चार होते ही बड़ी अवज्ञा से दृष्टि फेर, मंगलसूत्र दाँतों में दबा पत्रिका पढ़ने लगतीं।
गाड़ी ने सीटी दी और ठीक इसी समय, हमारे साथ की चौथी महिला ने डिब्बे में प्रवेश किया। गाड़ी मानो उन्हीं के लिए रुकी थी। डाँट-डपट की फुफकारें छोड़ती गाड़ी चली और उसी धक्के के साथ वे महिला, फद्द से सीट पर लुढ़क पड़ीं। उनके हाथ में बेंत की बनी एक छोटी-सी टोकरी थी और काँख में चौकोर बटुआ दबा था। “ओफ़् लगता था गाड़ी छूट ही जाएगी। बाप रे बाप, कैसी दौड़ लगानी पड़ी!" मैं उन्हें देखती ही रह गई, समाज-सेविका ने जासूसी उपन्यास बंद कर दिया, मराठी मोनालिसा ने चश्मा उतारकर हाथ में ले लिया और बैठ गई।
हम तीनों की ही दृष्टि उस चौथी पर आबद्ध हो गई। दोष हमारा नहीं था, वह चीज़ ही देखने लायक थी।
हमारा घूरना उन्होंने भाँप लिया, "केम बेन, बहुत लंबी हूँ न मैं।" वह हँसी, छह फीट साढ़े दस इंच टु बी एक्ज़ैक्ट, शायद भारत की सबसे लंबी नारी। चलिए, अच्छा है कि इस डिब्बे में आज हम चारों महिलाएँ ही हैं, नहीं तो मुए पुरुष भी मुझे घूरते।" फिर वे दनादन हमारा इंटरव्यू लेने लगीं। पहला प्रहार मुझ पर ही हुआ। समाज सेविका ने ठक-ठककर दो-तीन रूखे उत्तरों के चाँटे धर दिए।
महाराष्ट्री महिला ने 'हिंदी नहीं जानता' कह पीठ फेर ली, तो उस महिला ने त्रुटिहीन अंग्रेजी में धाराप्रवाह भाषण झाड़ दिया, "मुझे मदालसा कहते हैं, मदालसा सिंघाड़िया। कल ही प्रिटोरिया से आई हूँ, अपने पति की मृत देह लेने।" मैं चौंक गई। समाज-सेविका ने अपने रूखे व्यवहार पर लज्जित होकर, चट आगे बढ़ उसके दोनों हाथ थाम लिए, "अरे, राम-राम, कोई दुर्घटना हो गई थी क्या ?" उन्होंने बड़े दर्द से पूछा।
मदालसा की वेशभूषा में सद्यः वैधव्य का कहीं कोई चिह्न नहीं था। वे लंबी होने पर भी पठानिन सी गठे कसे शरीर की लावण्यमयी गतयौवना थीं। उनके बाल किसी नामी सैलून में कटे-संवरे लग रहे थे। अपनी धानी रेशमी साड़ी को वे हाफ पैंट की भाँति ऊपर चढ़ा, दोनों पैरों की पालथी मार, आराम से जम गईं।
"असल में पिछले वर्ष, एक पर्वतारोही दल के साथ मेरे पति भारत आए थे,
वहीं एक एवलैंस (तूफ़ान) के नीचे दबकर उनकी मृत्यु हो गई।" "च्च च्च च्च, तो क्या मृत देह अब मिली ?" मैंने पूछा।
"हाँ, भारत सरकार ने मुझे सूचित किया, तो भागती आई बर्फ में दबी देह, सुना ज्यों की त्यों मिली है। मेरे बुने स्वेटर का, जिसे उन्होंने पहना था, एक फंदा भी टूटा।"
मृत पति की स्मृति ने उन्हें भाव-विभोर कर दिया, बटुए से मर्दाना रूमाल निकाल, वे कभी आँखें पोंछने लगीं, कभी अपनी सूर्पनखा-सी लंबी नाक बेचारी करतीं भी क्या ! कोई भी जनाना रूमाल उस नाक का अस्तित्व नहीं संभाल सकता था।
अचानक हम तीनों को, बेचारी मदालसा का एक वर्ष पुराना वैधव्य, एकदम
ताज़ा लगने लगा।
"तो क्या अब आप अपने "हसबैंड" का "डैड बॉडी" लेकर प्रिटोरिया फ्लाई करेगा ?"-महाराष्ट्री महिला ने पूछा।
"नहीं, बैन!" मदालसा सीट पर लेट गई, तो लगा एक लंबे खजूर का कटा पेड़ ढह गया।
एक लंबी साँस खींचकर उन्होंने कहा, "मैं असल में सती होने भारत आई हूँ!" - हम तीनों को एक साथ अपने इस उत्तर का क्लोरोफॉर्म सुँधा, सती ने एकदम आँखें मूंद लीं, जैसे वह चाह रही थीं कि अब हम उन्हें शांति से पड़ी रहने दें।
ऐसा भी भला किसी ने सुना था इस युग में ! सुस्पष्ट उच्चारण में अंग्रेजी बोलने बाली, छह फीट साढ़े दस इंच की यह काया, कल बर्फ में दबी पति की एक साल बासी लाश को छाती से लगा, जल-भुनकर राख हो जाएगी।
"नहीं, आपको ऐसी मूर्खता करने का कोई अधिकार नहीं है। यह एक अपराध है, क्या आप यह नहीं जानतीं?" खादीधारी महिला उठकर मदालसा के सिरहाने बैठों, ऐसी गंभीर भाषण की गोलाबारी झाड़ने लगीं, जैसे चिता सचमुच प्रज्वलित हो चुकी है और सती लपटों में कूदने को तत्पर है।" भावावेश के दुर्बल क्षणों में नारी कभी-कभी बड़ा बचपना कर बैठती है, इसका मुझे व्यापक अनुभव है। अभी हाल ही में मेरे आश्रम की दो युवतियाँ ऐसी मूर्खता कर बैठीं। मुझे ही देखिए, भारत- विभाजन के समय मेरे पति की हत्या कर दी गई, पर मैं क्या सती हो गई ? सिली सेंटिमेंट! यदि मैं भी उस दिन आपकी भाँति सती हो जाती तो आज यह देह दीन- दुखियों के काम आ सकती थी? पहले मॉडल जेल की अध्यक्षा रही और अब गिरी बहनों के आश्रम की देखरेख करती
"ना, बैन, ना।" मदालसा ने करवट बदली, "मैं तो सती होने ही भारत आई हूँ। हाय मेरा नीलरतन, नीलू डार्लिंग।" कह वह फिर मर्दाने रूमाल से मुँह छिपाकर सिसकने लगीं।
"आप चाहें तो मैं आपके साथ चल सकती हूँ आपके पति के अंतिम संस्कार में सहायता कर आपको अपने आश्रम में ले चलूँगी।" समाज सेविका ने अपने उदार प्रस्ताव का चुग्गा डालकर मदालसा को रिझाने की चेष्टा की।
मदालसा बड़ी उदासी से हँसी, "धन्यवाद बैन पर ब्रह्मा भी अब मुझे अपने निश्चय से नहीं डिगा सकते। यह रोग हमारे खानदान में चला आया है। मेरी परनानी तो राजा राममोहन राय और सर विलियम बैंटिक को भी मिस्सा देकर सती हो गई थीं और नानी जी के लिए तो लोग कहते हैं कि नाना जी की मृत देह गोद में लेकर चिता में बैठते ही, स्वयं चिता धू-धूकर जल उठी थी। फिर मेरी माँ और अब मैं।"
"खैर, हटाइए भी, पता नहीं किस धुन में आकर आप लोगों से कह गई। आई शुड हैव टोल्ड यू (मुझे आपसे नहीं कहना चाहिए था)। चलिए, हाथ-मुँह धोकर खाना खा लिया जाए। क्यों, क्या ख्याल है ?" उन्होंने अपनी कदली स्तंभ- सी जंघाओं पर दोनों हाथों से त्रिताल का टुकड़ा-सा बजाया।
हम तीनों को एक बार फिर आश्चर्य-उदधि में गोता लगाने को छोड़, वे टोकरी से एक स्वच्छ तौलिया, साबुन निकालकर गुसलखाने में घुस गई। उनके जाते ही हम तीनों परम मैत्री की एक डोर में गुँथ गए।
"अजीब औरत है। क्या आप सोचती हैं यह सचमुच सती होने जा रही है ?". मैंने मराठी महिला से पूछा।
"देखिए, मरने वाला कभी ढिंढोरा पीटकर नहीं मरता।" वह हँसकर बोलीं, "हमको तो इसका यह स्क्रू ढीला लगता है," उन्होंने अपने माथे की ओर उँगली घुमाई, "इस जमाने में ऐसे सी-फती कोई नहीं होती।"
'क्षमा कीजिएगा, " खादीधारी महिला बड़ी गंभीरता से बोलीं, “मुझे औरतों का अनुभव आप दोनों से अधिक है। मैं ऐसी भावुक प्रकृति की भोली औरतों को चेहरा देखते ही पहचान लेती हूँ। आँखें नहीं देखी आपने ? कितनी निष्पाप, पवित्र और उदार हैं। मुझे पक्का विश्वास है कि पति की मृत देह देखते ही यह वही मूर्खता कर बैठेगी जिसका यह खुलेआम ऐलान कर रही है। लगता है मुझे अपना प्रोग्राम कैंसिल कर, इसके साथ जा पुलिस को खबर देनी होगी तभी इसे बचाया जा सकता है। "
इतने में ही मदालसा, हाथ-मुँह धोकर ताजा चेहरा लिए आ गई। मेलगाड़ी वन, ग्राम, नदी, नाले, पुल कूदती- फाँदती सरटि से भागी जा रही थी। मदालसा ने अपनी टोकरी खोलकर नाश्तादान निकाल लिया। जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, ऐसे ही एक यात्री को खाते देख दूसरे सहयात्री को भी भूख लग आती है। क्षण-भर में सती प्रथा पर चल रही बहस कपूर के धुएँ की भाँति उड़ गई और चटाचट नाश्तेदान खुलने लगे।
"आइए न, एक साथ बैठकर खाया जाए।" मदालसा ने कहा और बड़े यत्न से, स्वच्छ नेपकिन बिछा, छोटे-छोटे स्टील के कटोरदान सजाने लगीं।
धन्यवाद।" मैंने कहा, "पर हमारे साथ भी तो खाना है, इसे कौन खाएगा?" "वाह जी वाह, उसे हम खाएँगी, ईश्वर ने यह छह फीट साढ़े दस इंच दुर्ग आखिर बनाया किसलिए है?" उनकी भुवनमोहिनी हँसी ने हमें पराजित कर दिया।
वैसे भी हम तीनों ने एक-दूसरों को, काकदृष्टि से, सती के घृत- पकवान को आँखों ही आँखों में घूरते चखते पकड़ भी लिया था। सुनहरी कच थीं, मसालों की गहरी पर्त में डूबी सब्जियाँ था, रायता था, चटनी थी और ये ठाँ ठाँसकर बाँधे गए मेवा - जड़े बूंदी के लड्डू। "यह तो सफर का खाना नहीं, अच्छ खासा विवाह-भोज है,” समाज सेविका की आँखों से लार टपक रही थी. "बड़ी हैवी खाना लेकर चली हैं आप!" उन्होंने कहा और कचौड़ियों पर टूट पड़ीं।
हम तीनों के पास, भारतीय रेल यात्रियों के साथ युग-युगांतर से चली आ रही वही पूरी तरकारी और आम के अचार की फर्कि थीं। अपना खाना खाया हो किसने! मदालसा के स्वादिष्ट भोजन को चटखारे ले-लेकर हम तीनों ने साफ कर दिया। उधर वे अकेली ही हम तीनों के नाश्तादानों को जीभ से चाट गई थी। विधाता ने सचमुच ही उनके शरीर के दुर्ग में, असीम गोला-बारूद भरने के लिए, अनेक कोष्ठ प्रकोष्ठों की रचना की थी। महातृप्ति के कई तार और मंद्र सप्तक की डकार लेकर, हाथ-मुँह धो, मदालसा ने टोकरी में से एक मस्जिद के गुंबद के आकार का पानदान निकाला।
"यह मेरे नीलू ने मुझे बगदाद से लेकर भेंट किया था। उसे पान बेहद पसंद थे, इसी से एक ढोली मघई पान और यह पानदान लेकर ही कल चिता में उतरूंगी।" एक शहीदाना अदा से हम तीनों को घायल कर उन्होंने केवड़ा, इलायची और मैनपुरी सुपारी से उसा बीड़ा थमाया।
सती-प्रथा पर फिर जोरदार बहस छिड़ गई "हाय, मेरे अंतिम सफर की प्यारी साथिनों, तुम अब हमें नहीं रोक सकतीं," मदालसा लेट गई और बड़ी संघी आवाज में गाने लगी, ""न जायूं जानकी नाथे, सवारे शृं थवानूं है, ' समझ इसका अर्थ?" उन्होंने हँसकर मुझसे पूछा, "जानकीनाथ भी यह नहीं जान सके थे कि सुबह क्या होगा।"
अब मुझे लगता है, उस गुजराती पद की व्याख्या उन्होंने संभवत: हमारे ही हित में की थी! “चलो जी, अब सो जाओ सब, आज इस पृथ्वी पर मेरी यह अंतिम निद्रा है बेन, बहस व्यर्थ है। चलो गुडनाइट और बहुत प्यारे-प्यारे सपने दिखें तुम तीनों को।" सचमुच ही उसकी शुभकामनाओं ने जादू का असर किया। ऐसी नींद तो पहले कभी आई ही नहीं थी और सपने?
कभी लगता-जगमगाते आभूषणों के ढेर में गोते खा रही हूँ, हीरे के हारों से गर्दन टूटी जा रही है, बाजूबंद अंगूठियों के भार से हड्डियाँ खिसकी जा रही हैं। और साड़ियाँ ? क्या-क्या रंग है, कैसा चिकना रेशम साड़ियों के विशाल उदधि में रंगीन कीमती साड़ियों की तरंगें रह-रहकर उठ रही हैं। इससे प्यारे सपने और क्या दिख सकते थे? पर सपनों का अंत भी समुद्र के ज्वार-भाटे की ही भाँति हुआ- वास्तविकता की अंतिम तरंग ने पटाक से हम तीनों को धोबी पछाड़ दी, आँखें खोलीं तो सती गायब थी।
"हाय मेरे स्टील का बक्स!" मिसेज वनोलकर बर्थ से उतरते ही लड़खड़ा गईं, "उसमें तो मेरे विवाह का जड़ाऊ सेट था। लगता है वह सती की बच्ची हमें कुछ विष खिला गई। सिर फटा जा रहा है।" उनका गला भर्रा गया। हाँ, ठीक ही तो कह रही थीं, मुझे कोई जैसे सावन के झूले की ऊँची-ऊँची पैगें दे रहा था, पूरा डिब्बा गोल-गोल घूम रहा था। पंखे के चारों ओर बल्ब, बल्ब के चारों ओर छत और छत के इर्द-गिर्द कई रेशमी साड़ियाँ और भारी-भारी आभूषण पहने स्वयं मैं लट्ट-सी घूम रही थी। कभी जी में आ रहा था जोर-जोर से हँसूं, कभी दहाड़ें मार कर रोने को तड़प रही थी बहुत पहले एक बार भाभी ने भंग खिलाकर ऐसी ही अवस्था कर दी थी।
सुना गया है कि कुकुरमुत्तों को पीसकर बनाया गया विष भी ऐसे ही मीठे सपने दिखाता है। उनको खाते ही गहरी नींद आ जाती है, जो कभी-कभी कई दिनों तक नहीं टूटती।
मीठे सपने दिखा, सजग मनुष्य को अर्धविक्षिप्त सा कर देने वाला यह अवश्य वही विष होगा। समाजसेविका दोनों हाथों से सिर धामे बिलख रही थीं, "हाय, मैं तो लुट गई। मेरे सूटकेस में आश्रम का दस हज़ार रुपया था।"
और मैं ? सहसा गोल-गोल घूमते रेल के डिब्बे में गोल घूमते मेरे दिमाग ने मुझे सूचित किया, "तुम्हारा बटुआ ले गई है, बटुआ !"
और ले भी क्या जाती! सामान तो कुछ था नहीं, पचपन रुपये और एक फर्स्ट क्लास का वापसी टिकट। सती की चिता में, मैं यही सामान्य सी घृताहुति दे पाई। चेन खींचकर गाड़ी रोकी गई, सचमुच ही समाज सेविका को पुलिस को खबर देनी पड़ी, पर सती को बचाने नहीं, पकड़वाने के लिए वह मिल जाती तो शायद हम तीनों स्वयं उसकी चिता चुनकर उसे झोंक देतीं। पर कहना व्यर्थ है, आज तक पुलिस उस सती मैया के फूल नहीं चुन पाई!
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