श्री वृंदावन लाल वर्मा का जन्म 9 जनवरी, 1889 को मऊरानीपुर, झांसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
सन् 1909 में इनका नाटक 'सेनापति ऊदल' छपा, परंतु वह पराधीनता का युग था इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा इसे जब्त कर लिया गया। सन 1920 तक ये छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे तथा 1921 में निबंध लेखन प्रारंभ किया। वर्मा जी ने अनेक उपन्यासों की रचना की है जिनमें 'मृगनयनी', 'गढ़ कुंडार', 'प्रत्यागत', 'कुंडलीचक्र', 'विराटा की पद्मिनी', 'झांसी की 'रानी', 'कचनार', 'टूटे काँटे', 'अमरबेल', 'भुवनविक्रम' आदि उल्लेखनीय हैं। इनके 'शरणागत', 'कलाकार का दंड' आदि सात कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।
वर्मा जी की अधिकांश रचनाएँ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रचित हैं, पर 'लगन', 'संगम', 'प्रत्यागत', 'प्रेम की भेंट', 'सोना', 'अमरबेल' -इनके सामाजिक उपन्यास हैं। इनका निधन 23 फरवरी, 1969 को हुआ ।
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3. शरणागत ( वृंदावन लाल वर्मा)
रज्जब अपना रोजगार करके ललितपुर लौट रहा था। साथ में स्त्री थी, और गाँठ दो-तीन सौ की बड़ी रकम मार्ग बीहड़ था और सुनसान ललितपुर काफ़ी दूर था, बसेरा कहीं-न-कहाँ लेना ही था, इसलिए उसने 'मङपुरा' नामक गाँव में ठहर जाने का निश्चय किया। उसकी पत्नी को बुखार हो आया था, रकम पास में थी, और बैलगाड़ी किराये पर करने में खर्च ज्यादा पड़ता था, इसलिए रज्जब ने उस रात आराम कर लेना ही ठीक समझा।
परंतु ठहरता कहाँ ! जात छिपाने से काम नहीं चल सकता था। उसकी पत्नी नाक और कानों में चाँदी की बालियाँ डाले थी और पैजामा पहने थी। इसके सिवाय गाँव के बहुत से लोग उसको पहचानते भी थे। वह उस गाँव के बहुत से कर्मण्य और अकर्मण्य ढोर खरीदकर ले जा चुका था।
अपने व्यवहारियों से उसने रात-भर के बसेरे के लायक स्थान की याचना की, किंतु किसी ने भी मंजूर न किया। उन लोगों ने अपने ढोर रज्जब को अलग-अलग और लुके-छिपे बेचे थे। ठहरने में तुरंत ही तरह-तरह की खबरें फैलतीं इसलिए सबने इंकार कर दिया।
गाँव में एक गरीब ठाकुर रहता था। थोड़ी-सी जमीन थी, जिसको किसान जोतते थे। निज का हल-बैल कुछ भी न था, लेकिन अपने किसानों से दो-तीन साल का पेशगी लगान वसूल कर लेने में ठाकुर को किसी विशेष बाधा का सामना नहीं करना पड़ता था। छोटा-सा मकान था, परंतु उसको गाँव वाले गढ़ी के आदर व्यंजक शब्द से पुकारा करते थे और ठाकुर को डर के मारे 'राजा' शब्द से संबोधित करते थे।
शामत का मारा रज्जब इसी ठाकुर के दरवाज़े पर अपनी ज्वरग्रस्त पत्नी को
लेकर पहुँचा। ठाकुर पौर में बैठा हुक्का पी रहा था। रज्जब ने बाहर से ही सलाम करके कहा-
"दाऊजू, एक बिनती है।" ठाकुर ने बिना एक रत्ती भर इधर-उधर हिले-डुले पूछा-"क्या ?"
रज्जब बोला-''मैं दूर से आ रहा हूँ। बहुत थका हुआ हूँ। मेरी औरत को जोर से बुखार आ गया है। जाड़े में बाहर रहने से न जाने इसकी क्या हालत हो जाएगी, इसलिए रात भर के लिए कहीं दो हाथ जगह दे दी जाए।"
"कौन लोग हो ?" ठाकुर ने प्रश्न किया।
तो कसाई।" रज्जब ने सीधा उत्तर दिया। चेहरे पर उसके
गिड़गिड़ाहट थी।
ठाकुर की बड़ी-बड़ी आँखों में कठोरता छा गई। बोला, "जानता है, यह किसका घर है? यहाँ तक आने की हिम्मत कैसे की तूने?" रज्जब ने आशा-भरे स्वर में कहा- "यह राजा का घर है, इसलिए शरण में आया
है।"
तुरंत ठाकुर की आँखों की कठोरता गायब हो गई। जरा नरम स्वर में बोला- "किसी ने तुमको बसेरा नहीं दिया?"
"नहीं, महाराज।” रज्जब ने उत्तर दिया। "बहुत कोशिश की, परंतु मेरे खोटे पेशे के कारण कोई सीधा नहीं हुआ।"
और वह दरवाजे के बाहर ही, एक कोने से चिपटकर बैठ गया। पीछे उसकी
पत्नी कराहती काँपती हुई गठरी-सी बनकर सिमट गई। ठाकुर ने कहा, "तुम अपनी चिलम लिए हो ?"
"हाँ, सरकार ।" रज्जब ने उत्तर दिया।
ठाकुर बोला "तब भीतर आ जाओ, और तमाखू अपनी चिलम से पी लो।
अपनी औरत को भी भीतर कर लो। हमारी पौर के एक कोने में पड़े रहना।" जब वे दोनों भीतर आ गए, ठाकुर ने पूछा "तुम यहाँ से कब उठकर जाओगे?"
जवाब मिला- " अँधेरे में ही, महाराज! खाने के लिए रोटियाँ बाँधे हैं, इसलिए पकाने की ज़रूरत न पड़ेगी।"
"तुम्हारा नाम?"
" रज्जब ।"
थोड़ी देर के बाद ठाकुर ने रज्जब से पूछा - "कहाँ से आ रहे हो ?"
रज्जव ने स्थान का नाम बतलाया।
"वहाँ किसलिए गए थे?
" अपने रोजगार के लिए।"
'काम तो तुम्हारा बहुत बुरा है !"
"क्या करूँ पेट के लिए करना पड़ता है। परमात्मा ने जिसके लिए जो रोजगार मुकर्रर किया है, वही उसको करना पड़ता है।" "क्या नफा हुआ?" प्रश्न करने में ठाकुर को जरा संकोच हुआ, और प्रश्न
का उत्तर देने में रज्जब को उससे बढ़कर। रज्जब ने जवाब दिया-"महाराज, पेट के लायक कुछ मिल गया है, यों ही।"
ठाकुर ने इस पर कोई जिद नहीं की।
रज्जव एक क्षण बाद बोला "बड़े भोर उठ कर चला जाऊँगा तब तक घर के लोगों की तबीयत भी अच्छी हो इसके बाद दिन-भर के थके हुए पति-पत्नी सो गए। काफ़ी रात गए कुछ लोगों
ने एक बँधे इशारे से ठाकुर को बाहर बुलाया। एक फटी-सी रजाई ओढ़े ठाकुर साहब बाहर निकल आया। आगंतुकों में से एक ने धीरे से कहा-"दाऊजू ! आज तो खाली हाथ लौटे हैं।
कल संध्या का सगुन बैठा है।"
ठाकुर ने कहा- " आज जरूरत थी। खैर, कल देखा जाएगा। क्या कोई उपाय किया था?"
"हाँ -" आगंतुक बोला- " एक कसाई रुपये की मोट बाँधे इसी ओर आया है, परंतु हम लोग ज़रा देर में पहुँचे। वह खिसक गया। कल देखेंगे। जरा जल्दी।" ठाकुर ने घृणासूचक स्वर में कहा- “कसाई का पैसा न छुएँगे।"
"क्यों ?"
"बुरी कमाई!"
"उसके रुपयों पर कसाई थोड़े ही लिखा है।"
"रुपया तो दूसरों का ही है। कसाई के हाथ में आने से रुपया कसाई नहीं
हुआ।"
"मेरा मन नहीं मानता, वह अशुद्ध है।" "हम अपनी तलवार से उसको शुद्ध कर लेंगे।"
ज्यादा बहस नहीं हुईं। ठाकुर ने कुछ सोचकर अपने साथियों को बाहर का बाहर ही टाल दिया।
भीतर देखा, कसाई सो रहा था, उसकी पत्नी भी ठाकुर भी सो गया।
सवेरा हो गया, परंतु रज्जब न जा सका। उसकी पत्नी का बुखार तो हलका हो गया था, परंतु शरीर भर में पीड़ा थी, और वह एक कदम भी नहीं चल सकती थी। ठाकुर उसे वहीं ठहरा हुआ देखकर कुपित हो गया।
रज्जब से बोला- "मैंने खूब मेहमान इकट्ठे किए हैं। गाँव भर थोड़ी देर में तुम लोगों को मेरी पौर में टिका हुआ देखकर तरह-तरह की बकवास करेगा। तुम बाहर जाओ और इसी समय।"
रज्जब ने बहुत विनती की, किंतु ठाकुर न माना। यद्यपि गाँव उसके दबदबे
की मानता था, परंतु अव्यक्त लोक मत का दवदवा उसके मन पर भी था इसलिए
रज्जब गाँव के बाहर सपत्नीक एक पेड़ के नीचे जा बैठा और हिंदू मात्र को मन-
ही मन कोसने लगा।
उसे आशा थी कि पहर-आध पहर में उसकी पत्नी की तबीयत इतनी स्वस्थ हो जाएगी कि वह पैदल यात्रा कर सकेगी, परंतु ऐसा न हुआ तब उसने एक गाड़ी किराये पर कर लेने का निर्णय किया।
मुश्किल से एक छोटी जाति का व्यक्ति काफी किराया लेकर ललितपुर गाड़ी ले जाने के लिए राजी हुआ। इतने में दोपहर हो गई। उसकी पत्नी को जोर का बुखार हो आया। वह जाड़े के मारे थर-थर काँप रही थी, इतनी कि रज्जब की हिम्मत उसी समय ले जाने की न पड़ी। गाड़ी में अधिक हवा लगने के भय से रज्जब ने उस समय तक के लिए यात्रा को स्थगित कर दिया, जब तक कि उस 'बेचारी की कम-से-कम कँपकँपी बंद न हो जाए।
घंटे डेढ़ घंटे बाद उसकी कँपकँपी बंद हो गई, परंतु ज्वर बहुत तेज़ हो गया। रज्जब ने अपनी पत्नी को गाड़ी में डाल दिया, और गाड़ीवान से जल्दी चलने को कहा।
गाड़ीवान बोला-'" दिन भर तो यहीं लगा दिया। अब जल्दी चलने को कहते हो !"
रज्जब ने मिठास के स्वर में उससे फिर जल्दी करने के लिए कहा।
वह बोला- "इतने किराये में काम नहीं चल सकेगा। अपना रुपया वापस लो। मैं घर जाता हूँ।”
रज्जब ने दाँत पीसे कुछ क्षण चुप रहा। सचेत होकर कहने लगा-"भाई, आफ़त सबके ऊपर आती है। मनुष्य मनुष्य को सहारा देता है, जानवर तो देते नहीं। तुम्हारे भी बाल-बच्चे हैं। कुछ दया के साथ काम लो।"
कसाई को दया पर व्याख्यान देते सुनकर गाड़ीवान को हँसी आ गई। "उसको टस से मस न होता देखकर रज्जब ने और पैसे दिए, तब उसने गाड़ी हाँकी ।
पाँच-छह मील चलने के बाद संध्या हो गई। गाँव कोई पास में न था। रज्जव की गाड़ी धीरे-धीरे चली जा रही थी। उसकी पत्नी बुखार में बेहोश सी थी। रज्जब ने अपनी कमर टटोली रकम सुरक्षित बँधी पड़ी थी।
रज्जब को स्मरण हो आया कि पत्नी के बुखार के कारण अंटी का कुछ बोझ कम कर देना पड़ा है और स्मरण हो आया गाड़ीवान का वह एक हठ जिसके कारण उसको कुछ पैसे व्यर्थ ही और दे देने पड़े थे। उसे गाड़ीवान पर क्रोध था, परंतु उसको प्रकट करने की उस समय उसके मन में इच्छा न थी।
बातचीत करके रास्ता काटने की कामना से उसने वार्तालाप आरंभ किया-
"गाँव तो यहाँ से दूर मिलेगा।" "बहुत दूर, वहाँ ठहरेंगे।"
"किसके यहाँ ?"
"किसी के यहाँ भी नहीं पेड़ के नीचे कल सवेरे ललितपुर चलेंगे।"
"कल का फिर पैसा माँग उठना।"
"कैसे माँग उगा ? किराया से चुका हूँ। अब फिर कैसे मग?" " जैसे आज गाँव में हठ करके माँगा था बेटा ललितपुर होता तो बतला देता।"
"क्या बतला देते ? क्या सेंतमेत गाड़ी में बैठना चाहते थे?"
"क्यों बे, क्या रुपया देकर भी सैंतमेत का बैठना कहाता है? जानता है, मेरा नाम रज्जब है। अगर बीच में गड़बड़ करेगा तो साले को यहीं छुरी से काटकर कहीं फेंक दूंगा और गाड़ी लेकर ललितपुर चल दूँगा।"
रज्जब क्रोध को प्रकट नहीं करना चाहता था, परंतु शायद अकारण ही वह
भली-भाँति प्रकट हो गया।
गाड़ीवान ने इधर-उधर देखा। अँधेरा हो गया था। चारों ओर सुनसान था । आस-पास झाड़ी खड़ी ऐसा जान पड़ता था, कहीं से कोई अब निकला और अब निकला। रज्जब की बात सुनकर उसकी हड्डी-हड्डी काँप गई, ऐसा जान पड़ा मानो पसलियों को उसकी ठंडी छुरी छू रही हो।
गाड़ीवान चुपचाप बैलों को हाँकने लगा। उसने सोचा-गाँव के आते ही गाड़ी छोड़कर नीचे खड़ा हो जाऊँगा, और हल्ला-गुल्ला करके गाँववालों की मदद से अपना पीछा रज्जब से छुड़ाऊँगा । रुपए-पैसे भले ही वापस कर दूँगा, परंतु और आगे न जाऊँगा, कहीं सचमुच मार्ग में मार न डाले।
गाड़ी थोड़ी दूर और चली होगी कि बैल ठिठककर खड़े हो गए। रज्जब सामने
न देख रहा था, इसलिए जरा कड़ककर गाड़ीवान से बोला “क्यों वे बदमाश! सो गया क्या?" अधिक कड़क के साथ सामने रास्ते पर खड़ी हुई एक टुकड़ी में से किसी के कठोर कंठ से निकला "खबरदार, जो आगे बढ़ा।"
रन्जय ने सामने देखा कि चार-पाँच आदमी बड़े-बड़े लट्ठ बाँधकर न जाने कहाँ से आ गए हैं। उनमें से तुरंत ही एक ने बैलों की जुआरों पर एक लट्ठ पटका और दो दाएँ-बाएँ आकर रज्जब पर आक्रमण करने को तैयार हो गए।
गाड़ीवान गाड़ी छोड़कर नीचे जा खड़ा हुआ। बोला- "मालिक! मैं तो गाड़ीवान हूँ। मुझसे कोई सरोकार नहीं। "
"यहाँ कौन है?" एक ने गरजकर पूछा- गाड़ीवान धिग्मी बंध गई। कोई उत्तर न दे सका।
रज्जब ने कमर की गाँठ को एक हाथ से सँभालते हुए बहुत ही विनम्र स्वर में कहा-''मैं बहुत गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुछ नहीं है। मेरी औरत गाड़ी में बीमार पड़ी है। मुझे जाने दीजिए।"
उन लोगों में से एक ने रज्जब के सिर पर लाठी उबारी।
गाड़ीवान खिसकना चाहता था कि दूसरे ने उसको पकड़ लिया। अब उसका मुँह खुला बोला "महाराज, मुझको छोड़ दो। मैं तो किराए पर गाड़ी लिए जा रहा हूँ। गाँठ में खाने के लिए तीन-चार आने पैसे ही हैं।"
" और यह कौन है। बतला।" उन लोगों में से एक ने पूछा। गाड़ीवान ने तुरंत उत्तर दिया। "ललितपुर का एक कसाई।"
रज्जब के सिर पर जो लाठी उबारी गई थी, वह वहीं रह गई. लाठीवाले के मुँह से निकला। "तुम कसाई हो? सच बताओ?" "हाँ, महाराज।" रज्जब ने सहसा उत्तर दिया। "मैं बहुत गरीब हूँ, हाथ
जोड़ता हूँ, मुझको मत सताओ मेरी औरत बहुत बीमार है!"
औरत जोर से कराही ।
लाठीवाले उस आदमी ने अपने एक साथी से कान में कहा "इसका नाम
रज्जव है। छोड़ो, चलो यहाँ से।"
उसने न माना। बोला। "इसका खोपड़ा चकनाचूर करो, दाऊ जी ! यदि वैसे न माने तो असाई कसाई हम कुछ नहीं मानते।" "छोड़ना ही पड़ेगा।" उसने कहा "इस पर हाथ न पसारेंगे और न पैसा
छूएँगे!” दूसरा बोला। "क्या कसाई होने के डर से? दाऊ जी ! आज तुम्हारी बुद्धि पर पत्थर पड़ गए हैं, मैं देखता हूँ ।" और वह तुरंत लाठी लेकर गाड़ी पर चढ़ गया।
लाठी का एक सिरा रज्जब की छाती में अड़ाकर उसने तुरंत रुपया-पैसा निकालकर देने का हुक्म दिया। नीचे खड़े हुए उस व्यक्ति ने जरा तीव्र स्वर में कहा । "नीचे उतर आओ, उससे मत बोलो । उसको औरत बीमार है।"
"हो मेरी बला से, " गाड़ी में चढ़े हुए लठैत ने उत्तर दिया- "मैं कसाइयों की दवा हूँ।" और उसने रज्जब को फिर धमकी दी। नीचे खड़े हुए उस व्यक्ति ने कहा- "खबरदार, जो उसे छुआ नीचे उतरो, नहीं तो तुम्हारा सिर चूर किए देता हूँ। वह मेरी शरण आया था। "
गाड़ीवान लठैत झक-सी नीचे उतर आया।
नीचे वाले व्यक्ति ने कहा- "सब लोग अपने घर जाओ। राहगीरों को तंग मत
करो।" फिर गाड़ीवान से बोला
"जा रे, हाँक ले जा गाड़ी ठिकाने तक पहुँचा आना, तब लौटना, नहीं तो अपनी खैर मत समझियो और तुम दोनों में से किसी ने भी कभी इस बात की चर्चा कहीं की तो भूसी की आग में जलाकर खाक कर दूँगा।"
गाड़ीवान गाड़ी लेकर बढ़ गया। उन लोगों में से जिस आदमी ने गाड़ी पर चढ़ कर रज्जब के सिर पर लाठी तानी थी, उसने क्षुब्ध स्वर में कहा । "दाऊ जी ! आगे से कभी आपके साथ न आऊँगा।"
दाऊ जी ने कहा । " न आना। मैं अकेले ही बहुत कर गुज़रता हूँ, परंतु बुंदेला शरणागत के साथ घात नहीं करता, इस बात को गाँठ बाँध लेना।"
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