स्वतंत्रता संग्राम की सक्रिय सेनानी तथा की अमर गायिका श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, सन् 1904 में इलाहाबाद में हुआ। देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लेने के कारण इन्हें कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी।
इनके काव्य संग्रह 'मुकुल' पर सन् 1931 में साहित्य सम्मेलन प्रयाग
द्वारा 'सेक्सरिया पुरस्कार' प्रदान किया गया। 15 फरवरी सन् 1948 में
एक मोटर दुर्घटना में इनकी असामयिक मृत्यु हो गई।
इनकी कविताओं पर देश-प्रेम तथा अपने प्राचीन गौरव की गहरी छाप है। 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई' से संबंधित 'खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी- शब्द आज भी युवकों के हृदय में वीरता के भाव जगाते हैं।
इन्होंने अपनी रचनाओं में शुद्ध खड़ी बोली का प्रयोग किया है। 'त्रिधारा' और 'मुकुल' इनके काव्य संकलन तथा 'बिखरे मोती' और 'उन्मादिनी' प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।
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2. गौरी (सुभद्रा कुमारी चौहान)
शाम को, गोधूलि की बेला कुली के सिर पर सामान रखवाए, जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आए, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वे पास पड़ी एक आरामकुर्सी पर, जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर-से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन झन की आवाज हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा, फिर करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ' भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, "चलो हाथ-मुँह धो लो, चाय तैयार है।"
"चाय," राधाकृष्ण जी चौक-से पड़े, "चाय के लिए तो मैंने नहीं कहा था।"
"नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो, चलकर, " कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।
" अच्छा चलो", कहते हुए राधाकृष्ण जी पत्नी के पीछे-पीछे चले गए।
गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को विवाह की चिंता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं है। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी करें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिंता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं, गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती-"क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गई हूँ? रात-दिन सिवा मेरे विवाह के उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं।" तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसका जी चाहता कि धरती फटे और वह समा जाए, किंतु ऐसा कभी न हुआ।
गौरी- वह गौरी जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना-भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था- राधाकृष्ण जी के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। वे उसका विवाह योग्य वर के साथ करना चाहते थे यही सबसे बड़ी कठिनाई थी योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवीं साल चल रहा था, फिर भी वे उस के हाथ पीले न कर सके थे गौरी ही उनकी अकेली संतान थी। छुटपन से ही गौरी का बड़ा लाड़- प्यार हुआ था। प्रायः उसकी उचित-अनुचित सभी हठ पूरी हुआ करती थी। इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़ निश्चयी और हठीला था। वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा न सकता था। पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि वह पिता से साफ़-साफ़ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या? विवाह करना है कर दें किसी के साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी। उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता, अब उससे सही नहीं जाती, किंतु संकोच और लज्जा जबान पर ताला- सा डाल देते। हज़ार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कर सकी।
पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई। राधाकृष्ण जी ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी हुई एक कुर्सी पर बैठ गए। वहीं एक मेज पर कुंती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं। पूरियों की तरफ़ राधाकृष्ण जी ने देखा भी नहीं। चाय का प्याला उठाकर पीने लगे।
ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुंती स्वयं ही जैसे अपराधिनी हो कुंती ने डरते-डरते पूछा, "जहाँ गए थे, क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?"
"नहीं, यह बात नहीं है।"
कुंती ने उत्सुकता से पूछा, "फिर क्या बात है ? लड़के को देखा ?"
"हाँ, देखा, अच्छी तरह देखा ! हुँ!" कह राधाकृष्ण जी फिर चाय पीने लगे। कुंती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, "जरा समझाकर कहो। तुम्हारी बात तो समझ ही आती।"
राधाकृष्ण" समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का लड़का नहीं, आदमी है- तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह ?". कुंती- "विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है? फ़ोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।"
राधाकृष्ण-" "रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है। इतनी सिधाई भी तो अच्छी नहीं होती कि जिसके पीछे आदमी आदमी न दिखे। और फिर उमर में भी तो अधिक है : 35-36 साल ! साथ ही दो बच्चे भी हैं। उन्हीं बच्चों को सँभालने के लिए तो वे विवाह करना चाहते हैं, नहीं तो शायद न करते उनकी दूसरी शादी है। उनकी उमंगें, उनका उत्साह सब ठंडा पड़ गया है। वे अपने बच्चों के लिए एक धाय चाहते हैं, पर मेरी लड़की की तो दूसरी शादी नहीं है और ये तो साफ़- साफ़ कहते हैं कि मैं बच्चों के लिए विवाह करना चाहता हूँ।"
कुंती "जिन्हें दूसरी शादी करनी होती है, ये सब बच्चों के ही बहाने तो शादी करते हैं, नहीं तो क्या यह कहें कि अपने लिए करते हैं ?"
राधाकृष्ण "अरे, नहीं नहीं, वह आदमी कपटी नहीं है। उनके भीतर कुछ और बाहर कुछ हो ही नहीं सकता। हृदय तो उनका दर्पण की तरह साफ़ है, पर उनका खादी का कुरता, गांधी टोपी, फटे-फटे चप्पल देखकर जी हिचकता है। वह कहीं नेता बनकर व्याख्यान देने लायक तो है, पर किसी के घर दूल्हा बनकर जाने लायक नहीं हैं। इसके अलावा तीस रुपये कुल उनकी तन्खाह है। कांग्रेस दफ्तर में सेक्रेटरी का काम करते हैं। तीन बार जेल जा चुके है। किस दिन चले जाएँ, कुछ ठिकाना नहीं।"
कुंती- "आदमी तो बुरा नहीं जान पड़ता।"
राधाकृष्ण "बुरा आदमी तो मैं भी नहीं कहता उसे, पर वह गौरी का पति होने
लायक नहीं है, सच बात यह है।"
कुंती - "फिर तुमने क्या कह दिया ?"
राधाकृष्ण - "क्या कह देता ? उन्हें बुला आया हूँ। अगले इतवार को आवेंगे, जिससे तुम भी उन्हें देख लो। वे आने के लिए भी तो बड़ी मुश्किल से तैयार हुए।" कहने लगे-"नहीं साहब! मैं लड़की देखने न आऊँगा इस तरह लड़की देखकर मुझसे किसी लड़की का अपमान नहीं किया जाता।" फिर जब मैंने उन्हें समझाकर कहा कि आप लड़की को देखेंगे, लड़की और उसकी माँ आपको देख लेंगी, तब कहाँ बड़ी मुश्किल से राजी हुए।
गौरी दरवाजे की आड़ में खड़ी सब बातें सुन रही थी। जिस व्यक्ति के प्रति उसके पिता इतने असंतुष्ट और उदासीन थे, उसके प्रति गौरी के हृदय में अनजाने ही कुछ श्रद्धा के भाव जाग्रत हो गए। राधाकृष्ण जी पान का बीड़ा उठाकर अपनी बैठक में चले गए और उसी रात फिर उन्होंने अपने कुछ मित्रों और रिश्तेदारों को गौरी के लिए योग्य वर तलाशने को कई पत्र लिखे।
अगला इतवार आया। आज ही सीताराम जी, गौरी को देखने या अपने आपको दिखलाने आएँगे। राधाकृष्ण जी ने यह पहले से ही कह रखा है कि किसी बाहर वाले को कुछ न मालूम पड़े कि कोई गौरी को देखने आया है। अतएव यह बात कुछ गुप्त रखी गई है। घर के भीतरी आँगन में ही उनके बैठने का प्रबंध किया गया है तीन-चार कुर्सियों के बीच में एक मेज है, जिस पर एक साफ़ धुला हुआ खादी का कपड़ा बिछा दिया गया है और एक गिलास में आँगन के ही गुलाब के कुछ फूलों को तोड़कर गुलदस्ते का स्वरूप दिया गया है। बहुत ही साधारण-सा आयोजन है सीताराम जी सरीखे व्यक्ति के लिए किसी विशेष आडंबर की आवश्यकता भी तो न थी।
यथासमय सीताराम जी अपने दोनों बच्चों के साथ आए। बच्चे भी वही खादी के कुरते और हाफ़पैंट पहने थे न जूता, न मोजा, न किसी प्रकार का ठाठ-बाट, पर दोनों बड़े प्रसन्न, बड़े हँसमुख, आकर घर में वे इस प्रकार खेलने लगे, जैसे इस घर से वे चिर-परिचित हों। कुंती एक तरफ बैठी थी। बच्चों के कोलाहल से परिपूर्ण घर उसे क्षण-भर के लिए नंदनकानन सा जान पड़ा। उसने मन-ही-मन सोचा कितने अच्छे बच्चे हैं। यदि बिना किसी प्रकार का संबंध हुए भी सीताराम जी इन बच्चों के सँभालने का भार उसे सौंप दें, तो वह खुशी-खुशी ले ले। वह बच्चों के खेल में इतनी तन्मय हो गई कि क्षण-भर के लिए भूल बैठी कि सीताराम जी भी बैठे हैं और उनसे भी कुछ बातचीत करनी है। इसी समय अचानक छोटे बच्चे को जैसे कुछ याद आ गया हो, वह दौड़कर पिता के पास गया। उनके पैरों के बीच में खड़ा होकर बोला "बाबू, तुम तो कहते थे न, माँ को दिखाने ले चलते हैं, माँ कहाँ है, बतलाओ।"
सीतारामजी ने किंचित् हँसकर कहा "ये माँजी बैठी हैं, इनसे कहो, यही
तुम्हें दिखाएँगी।"
बालक ने मचलकर कहा-"ऊँहूँ, तुम दिखाओ।" इसी समय एक बड़ी-सी सफ़ेद बिल्ली आँगन से होती हुई भीतर को भाग गई। बच्चे बिल्ली के पीछे सब कुछ भूलकर, दौड़ते हुए अंदर पहुँच गए। गौरी पिछले बरामदे में चुपचाप खड़ी थी। वह न जाने किस ख्याल में थी। तब तक छोटे बच्चे ने उसका आँचल पकड़कर खींचते हुए पूछा- "क्या तुम अमारी माँ हो?"
गौरी ने देखा हष्ट-पुष्ट सुंदर सा बालक, कितना भोला, कितना निश्छल ! उसने बालक को गोद में उठाकर कहा-"हाँ।" बच्चे ने फिर उसी स्वर में पूछा "अमारे घर चलोगी न ? बाबू तो तुम्हें लेने
आए हैं औल हम भी आए हैं।" अब तो गौरी उसकी बातों का उत्तर न दे सकी। पूछा- "मिठाई खाओगे ?"
"हाँ, खाएँगे," दोनों ने एक ही साथ एक स्वर में उत्तर दिया।
कुछ क्षण बाद कुंती ने अंदर देखा कि छोटा बच्चा गौरी की गोद में और बड़ा उसी के पास बैठा मिठाई खा रहा है। एक निःश्वास के साथ कुंती बाहर चली गई। थोड़ी देर बाद ज्योंही गौरी ने ऊपर आँख उठाई, उसने माता-पिता दोनों को सामने खड़ा पाया। पिता ने स्नेह के स्वर में पुत्री से कहा- "बेटा, जरा चलो, चलती हो न ?"
गौरी ने कोई उत्तर न दिया। उसने बच्चों का हाथ-मुँह धुलाया, उन्हें पानी पिलाया, फिर माँ के पीछे-पीछे बाहर चली गई। बच्चे अब भी उसी को घेरे थे। वे उसे छोड़ना नहीं चाहते थे। बड़ी मुश्किल से सीताराम जी उन्हें बुलाकर कुछ देर तक अपने पास बिठा सके, किंतु जरा-सा मौका पाते ही फिर गौरी के आस- पास बैठ गए। पिता के विरुद्ध उन्हें कुछ नालिशें भी दायर करनी थीं, जो पिता के पास बैठकर न कर सकते थे।
छोटे ने कहा- "बाबू, अमें कभी खिलौने नहीं ले देते।" बड़े ने कहा- " मिठाई भी तो कभी नहीं खिलाते।"
छोटा बोला- "औल हमें छोड़कर दफ्तर चले जाते हैं, दिन-भर नहीं आते, बाबू अच्छे नई हैं।"
बड़ा बोला- "माँ, तुम चलो, नहीं तो हम भी यहाँ रहेंगे।" बच्चों की बातों से सभी को हँसी आ रही थी। कुंती ने बच्चों से कहा-"तो तुम दोनों भाई यहीं रह जाओ, बाबू को जाने दो, है न ठीक ?"
काफ़ी देर हो गई, यह देखकर सीताराम जी ने कहा- "समय बहुत हो चुका है, अब चलूँगा, नहीं तो शाम को ट्रेन न मिल सकेगी।" फिर राधाकृष्ण जी की तरफ देखकर कहा-" आप लोगों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। लड़की तो आपकी साक्षात् लक्ष्मी है, और यह मैं जानता था कि आपकी लड़की ऐसी ही होगी, इसलिए देखने को नहीं आना चाहता था।" फिर कुछ ठहरकर बोले-" और सच बात तो यह है कि मुझे पत्नी की उतनी जरूरत नहीं, जितनी इन बच्चों को जरूरत है एक माँ की मेरा क्या ठिकाना? आज बाहर हूँ तो कल जेल में मेरे बाद इनकी देख- रेख करने वाला कोई नहीं रहता। यही सोच-समझकर विवाह को तैयार हो सका हूँ, अन्यथा इस उमर में ?" कहकर वे स्वयं हँस पड़े।
राधाकृष्ण जी ने मन-ही-मन सोचा "तो मेरी लड़की इनके बच्चों की धाय बनकर जाएगी।" कुंती ने सोचा, "कोई भी स्त्री ऐसे बच्चों का लालन-पालन कर अपना जीवन सार्थक बना सकती है।" गौरी ने मन-ही-मन इस महापुरुष के चरणों में प्रणाम किया और बच्चों की ओर ममता भरी दृष्टि से देखा जैसे यह दृष्टि कह रही थी कि किसी विलासी युवक की पत्नी बनने के बजाय, मैं इन भोले-भाले बच्चों की माँ बनना पसंद करूंगी। सीताराम जी को जाने के लिए प्रस्तुत देख, बच्चे फिर गौरी से लिपट गए। यदि राधाकृष्ण जी झूठ ही सही, एक बार भी कहते कि बच्चों को छोड़ जाओ, तो सीताराम जी बच्चों को छोड़कर निश्चिंत होकर चले जाते। परंतु इस ओर से जब ऐसी कोई बात न हुई तो बच्चों को सिनेमा, सरकस और मिठाई का प्रलोभन देकर बड़ी कठिनाई से गौरी से अलग करके वे ले जा सके। जाते समय सीताराम जी को पक्का विश्वास था कि विवाह होगा, केवल तारीख निश्चित करने भर की देर है।
सीताराम जी उस पत्र की प्रतीक्षा में थे, जिसमें विवाह की निश्चित तारीख लिखकर आने वाली थी। देश की परिस्थिति, गवर्नमेंट का रुख और महात्मा जी के वक्तव्यों को पढ़कर वे जानते थे कि निकट भविष्य में फिर सत्याग्रह संग्राम छिड़ने वाला है। न जाने किस दिन उन्हें फिर जेल का मेहमान बनना पड़े। पिछली बार जब गए थे तब उनकी बूढ़ी बुआ थीं, पर अब तो वे भी नहीं रहीं। यह कहारिन क्या बच्चों की देखभाल कर सकेगी ? बच्चों की उन्हें बड़ी चिंता थी और बच्चे भी सदा ही 'माँ माँ' की रट लगाए रहते थे। उन्होंने फिर एक पत्र राधाकृष्ण जी को शीघ्र ही तारीख निश्चित करने के लिए लिख भेजा। उधर राधाकृष्ण जी दूसरी रही बात है कर रहे थे। उन्होंने सीताराम जी के पत्र के उत्तर में लिख भेजा कि गौरी को माँ पुराने ख्याल की हैं। वे बिना जन्मपत्री मिलवाए विवाह नहीं करना चाहतीं, अतएव आप अपनी जन्मपत्री भेज दें। पत्र पढ़ने के साथ ही सीताराम जी को यह समझने में देरी न लगी कि यह विवाह न करने का केवल बहाना मात्र है, किंतु फिर भी उन्होंने जन्मपत्री भेज दी। जन्मपत्री भेजने के कुछ ही दिन बाद उत्तर भी आ गया कि जन्मपत्री नहीं मिलती, इसलिए विवाह न हो सकेगा। क्षमा कीजिएगा।
राधाकृष्ण जी को गौरी के लिए दूसरा वर मिल गया था, जो उनकी समझ में गौरी के बहुत योग्य था। धनवान ये भी अधिक न थे, पर अभी-अभी नायब के पद पर नियुक्त हुए थे, आगे और भी उन्नति की आशा थी। बी० ए० पास थे, देखने में अधिक सुंदर न थे। बदशकल भी कहे जा सकते थे। पर पुरुषों की भी कहीं सुंदरता देखी जाती है ? उमर कुछ अधिक न थी, यही 24- 25 साल। लेने-देने का झगड़ा यहाँ भी न था। पहली शादी थी और माँ-बाप, भाई-बहिन से भरा-पूरा परिवार था। राधाकृष्ण जी इससे अधिक और चाहते भी क्या थे ? ईश्वर को उन्होंने कोटिशः धन्यवाद दिए, जिसकी कृपा से ऐसा वर उन्हें गौरी के लिए मिल गया।
विवाह आगामी आषाढ़ में होना निश्चित हुआ। दोनों तरफ से विवाह की तैयारी हो रही थी। राधाकृष्ण जी बड़ी तन्मयता के साथ गहने-कपड़ों का चुनाव करते थे। सोचते थे, “देर में शादी हुई तो क्या हुआ ? वर भी तो कितना अच्छा ढूँढ़ निकाला है।" कुंती भी खुश थी। उसकी आँखों में वह दृश्य झूलने लगता था कि उसका दामाद छोटा साहब हो गया है, बेटी-दामाद छोटे-छोटे बच्चों के साथ उससे मिलने आए हैं, किंतु बच्चों की बात सोचते ही उसे सीतारामजी के दोनों बच्चे तुरंत याद आ जाते, और आ जाती याद सीताराम जी की बात- "बच्चों की देख-रेख करने वाला कोई नहीं है।" फिर वह सोचती, "ऊँह, दुनिया में और भी तो लड़कियाँ हैं कर लें शादी क्या मेरी गौरी ही है?" इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ही प्रसन्न थे, पर गौरी से कौन पूछता कि उसके हृदय में कैसी हलचल मची रहती है? रह- रह कर उसे उन बच्चों का भोला-भाला मुँह और मीठी-मीठी बातें याद आ जातीं, और साथ ही याद आ जाते विनयी, नम्र और सादगी की प्रतिमा सीताराम जी। उनकी , याद आते ही श्रद्धा से गौरी का माथा अपने आप ही झुक जाता। देशभक्त, त्यागी वीरों के लिए उसके हृदय में बड़ा सम्मान था सीताराम जी ने भी तो वीर बनकर देश के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, नहीं तो बी०ए० पास करने के बाद क्या प्रयत्न करने पर उन्हें भी नायब तहसीलदारी न मिल जाती ? मिलती क्यों नहीं ? पर सीताराम जी सरकार की गुलामी पसंद करते तब न ! दूसरी ओर थे उनके होने वाले वर- नायब तहसीलदार साहब, जिन्हें अपने आराम, अपनी ऐश के लिए, ब्रिटिश गवर्नमेंट के ज़रा से इंगित मात्र पर निरीह देशवासियों के गले पर छुरी फेरने में जरा भी संकोच या हिचक नहीं; जिनके सामने कुछ चाँदी के टुकड़े फेंक दिए जाते हैं और वे दुम हिलाते हुए, निन्द्य से निन्द्य कर्म करने में भी किंचित् लज्जित नहीं होते। घृणा से गौरी का जी भर जाता, किंतु उसके उन मनोभावों को जानने वाला यहाँ कोई भी न था वह रात-दिन एक प्रकार की अव्यक्त पीड़ा से विकल- सी रहती थी। बहुत चाहती थी कि अपनी माँ से कह दे कि वह नायब तहसीलदार से शादी न करेगी, किंतु लज्जा उसे कुछ भी न कहने देती। ज्यों-ज्यों विवाह की तिथि नजदीक आती, गौरी की चिंता बढ़ती ही जाती थी।
विवाह की निश्चित तारीख से पंद्रह दिन पहले एक दिन एकाएक तार आया कि नायब तहसीलदार साहब के पिता का देहांत हो गया। इस मृत्यु के कारण विवाह साल भर को टल गया। गौरी के माता-पिता बड़े दुखी हुए, किंतु गौरी के सिर पर से जैसे चिंता का पहाड़-सा हट गया।
इसी बीच सत्याग्रह आंदोलन की लहर सारे देश-भर में बड़ी तीव्र गति से फैल गई। शहर-शहर में गिरफ्तारियों का ताँता-सा लग गया। रोज़ ही न जाने कितने गिरफ्तार होते, कितनों को सजा होती। कहीं लाठी चार्ज, कहीं धारा 144' ! सरकार की दमन को चक्की बड़े भयंकर रूप से चल रही थी। गौरी को उन बच्चों की चिंता थी। जबसे सत्याग्रह संग्राम छिड़ा था, तभी से उसे चिंता थी कि न जाने कब सीताराम जी गिरफ्तार हो जाएँ और फिर वे बच्चे बेचारे! उन्हें कौन देखेगा? रोज का अखबार ध्यान से पढ़ती थी और इसी प्रकार उसने एक दिन पढ़ा कि राजद्रोह के अपराध में सीताराम जी गिरफ्तार हो गए, और उन्हें एक साल का सपरिश्रम कारावास हुआ है। इस समाचार को पढ़कर गौरी कुछ क्षण तक स्तब्ध- सौ खड़ी रही। फिर कुछ सोचती हुई टहलने लगी। कुछ ही देर बाद उसने अपना कर्त्तव्य निश्चित कर लिया। वह माँ के पास गई। माँ कोई पुस्तक देख रही थी। उसने अपने सारे साहस को समेटकर दृढ़ता से कहा- "माँ, मैं कानपुर जाऊँगी।”
"कानपुर में क्या है ?"- आश्चर्य से कुंती ने पूछा।
गौरी- "वहाँ बच्चे हैं। "
माँ ने उसी स्वर में कहा-"बच्चे ? कैसी बात करती हो गौरी, पागलों की-
सी?" गौरी- "नहीं माँ, मैं पागल नहीं हूँ। बच्चों को तुम भी जानती हो। उनके पिता को राजद्रोह के मामले में साल भर की सजा हो गई है। बच्चे छोटे हैं। मैं जाऊँगी
माँ, मुझे जाना ही पड़ेगा।"
गौरी के स्वभाव से कुंती भली-भाँति परिचित थी। वह जानती थी कि गौरी जिस बात की हठ पकड़ती है, कभी छोड़ती नहीं। अतएव सहसा वह गौरी का विरोध न कर सकी, बोली-"पर तेरे बाबू जी तो बाहर गए हैं, उन्हें तो आ जाने दे।"
पर गौरी ने दृढ़ता के साथ कहा- "बाबू जी के आने तक नहीं ठहर सकूँगी माँ। मुझे जाने दो। रास्ते में मुझे कुछ कष्ट न होगा। अब मैं काफ़ी बड़ी हो गई हूँ।"
और उसी दिन शाम को एक नौकर के साथ गौरी कानपुर चली गई। साल भर बाद। अपनी सजा पूरी करके सीताराम जी घर लौटे। इस साल भर के भीतर उन्होंने एक बार भी बच्चों को न देखा था। उन्हें कायदे के अनुसार लगातार हर महीने उनका कुशल- समाचार मिल जाता था, पर उन्हें बच्चों की चिंता बनी ही रहती थी। जिस कहारिन के भरोसे वे बच्चों को छोड़ गए थे, उसके भी तीन- चार बच्चे थे। वह बच्चों को कैसे रखेगी, सो सीताराम जी जानते थे, पर विवशता थी, क्या करते ? सवेरे छह बजे ही जेल से मुक्त कर दिए गए। एक ताँगे पर बैठकर वे घर की ओर चले। जेब में कुछ पैसे थे। एक जगह गरम-गरम जलेबियाँ बन रही थीं। बच्चों के लिए थोड़ी-सी खरीद लीं। घर के दरवाजे पर पहुँचे। दरवाजा खुला था। घर के अंदर पैर रखने में हृदय धड़कता था। न जाने बच्चे किस हालत में हों? वे चोरों की तरह चुपके-चुपके घर में घुसे, परंतु यह क्या? आँगन में पहुँचते ही वे उगे-से खड़े रह गए। फिर जरा आगे बढ़कर उन्होंने कहा-" आप ?"
गौरी ने झुककर उनकी पद-धूलि माथे से लगा ली।
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