पुत्र-प्रेम ( प्रेमचंद) ISC गद्य संकलन (ISC Collection of Short Stories & Essay

1. प्रेमचंद

हिंदी के कथा एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के | वाराणसी के निकट लमही ग्राम में 31 जुलाई सन् 1880 को हुआ था। इनका वास्तविक नाम धनपतराय था।




ये उर्दू में नवाबराय के से कहानियाँ लिखा करते थे। हिंदी में

लेखन के लिए इन्होंने प्रेमचंद नाम का प्रयोग किया।

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ये उपन्यासकार, कहानीकार, संपादक

तथा निबंध लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। 8 अक्तूबर, सन् 1936 को

इनका निधन हो गया।

प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ हैं- 'सप्तसरोज', 'लालफीता', 'प्रेम पचीसी', "प्रेम प्रसून', 'प्रेम तीर्थ पंच प्रसून कहानी संग्रह 'सेवासदन', 'गबन' - 'गोदान', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'निर्मला', 'सेवा सदन', 'प्रेमाश्रम', 'कायाकल्प'

उपन्यास 'संग्राम', 'कर्वला', 'प्रेम की बेदी' - नाटक ।


1. पुत्र-प्रेम (प्रेमचंद)

बाबू चैतन्यदास ने अर्थशास्त्र खूब पढ़ा था, और केवल पढ़ा ही नहीं था, उसका यथायोग्य व्याहार भी वे करते थे। वे वकील थे, दो-तीन गाँवों में उनकी ज़मींदारी भी थी, बैंक में भी कुछ रुपये थे। यह सब उसी अर्थशास्त्र के ज्ञान का फल था। जब कोई खर्च सामने आता तब उनके मन में स्वभावतः प्रश्न होता था इससे स्वयं मेरा उपकार होगा या किसी अन्य पुरुष का ? यदि दो में से किसी का कुछ भी उपकार न होता तो वे बड़ी निर्दयता से उस खर्च का गला दबा देते थे। 'व्यर्थ' को वे विष के समान समझते थे। अर्थशास्त्र के सिद्धांत उनके जीवन-स्तंभ हो गए थे।

बाबू साहब के दो पुत्र थे। बड़े का नाम प्रभुदास था, छोटे का शिवदास। दोनों कॉलेज में पढ़ते थे। उनमें केवल एक श्रेणी का अंतर था। दोनों ही चतुर, होनहार युवक थे, किंतु प्रभुदास पर पिता का स्नेह अधिक था। उसमें सदुत्साह की मात्रा अधिक थी और पिता को उसकी जात से बड़ी-बड़ी आशाएं थीं। वे उसे विद्योन्नति के लिए इंग्लैंड भेजना चाहते थे। उसे बैरिस्टर बनाना उनके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी।

किंतु कुछ ऐसा संयोग हुआ कि प्रभुदास को बी० ए० की परीक्षा के बाद ज्वर आने लगा। डॉक्टरों की दवा होने लगी। एक मास तक नित्य डॉक्टर साहब आते रहे, पर ज्वर में कमी न हुई। दूसरे डॉक्टर का इलाज होने लगा, पर उससे भी कुछ लाभ न हुआ। प्रभुदास दिनोंदिन क्षीण होता चला जाता था। उठने-बैठने की शक्ति न थी। यहाँ तक कि परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने का शुभ-संवाद सुनकर भी उसके चेहरे पर हर्ष का कोई चिह्न न दिखाई दिया। वह सदैव गहरी चिंता में डूबा रहता था। उसे अपना जीवन बोझ सा जान पड़ने लगा था। एक रोज चैतन्यदास ने डॉक्टर साहब से पूछा- "यह क्या बात है कि दो महीने हो गए और अभी तक दवा का कोई असर नहीं हुआ ?"

डॉक्टर साहब ने संदेहजनक उत्तर दिया- "मैं आपको संशय में नहीं डालना चाहता। मेरा अनुमान है कि यह ट्युबरक्युलॉसिस है।"

चैतन्यदास ने व्यग्र होकर कहा- "तपेदिक ?" डॉक्टर- "जी हाँ, उसके सभी लक्षण दिखाई देते हैं।"

चैतन्यदास ने अविश्वास के भाव से कहा, मानो उन्हें कोई विस्मयकारी बात सुन पड़ी हो "तपेदिक हो गया।"

डॉक्टर ने खेद प्रकट करते हुए कहा "यह रोग बहुत ही गुप्त रीति से शरीर में प्रवेश करता है।"

चैतन्यदास मेरे खानदान में तो यह रोग किसी को न था। डॉक्टर- संभव है, मित्रों से इसके जर्म (कीटाणु) मिले हों। चैतन्यदास कई मिनट तक सोचने के बाद बोले-"अब क्या करना चाहिए ?" डॉक्टर दवा करते रहिए। अभी फेफड़ों तक असर नहीं हुआ है। इनके अच्छे होने की आशा है।

चैतन्यदास आपके विचार में कब तक दवा का असर होगा ?

डॉक्टर निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता, लेकिन तीन-चार महीने में ये स्वस्थ हो जाड़ों में इस रोग जोर कम हो जाया करता है।

चैतन्यदास अच्छे हो जाने पर ये पढ़ने में परिश्रम कर सकेंगे ? डॉक्टर मानसिक परिश्रम के योग्य तो ये शायद ही हो सकें।

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चैतन्यदास किसी सेनेटोरियम (पहाड़ी स्वास्थ्यालय) में भेज दूँ तो कैसा हो ?

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डॉक्टर बहुत ही उत्तम ।

चैतन्यदास - तब ये पूर्णरीति से स्वस्थ हो जाएँगे ?

डॉक्टर हो सकते हैं, लेकिन इस रोग को दबा रखने के लिए इनका मानसिक परिश्रम से बचना ही अच्छा है।

चैतन्यदास नैराश्य भाव से बोले "तब तो इनका जीवन ही नष्ट हो गया।"

गर्मी गई। बरसात के दिन आए, प्रभुदास की दिनोंदिन बिगड़ती गई। वह पड़े-पड़े बहुधा इस रोग पर की गई बड़े-बड़े डॉक्टरों की व्याख्याएँ पढ़ा करता था। अनुभवों से अपनी अवस्था की तुलना किया करता। पहले कुछ दिनों तक तो वह अस्थिरचित-सा हो गया था। दो-चार दिन भी दशा सँभली रहती तो पुस्तकें देखने लगता और विलायत यात्रा की चर्चा करता। दो-चार दिन भी ज्वर का प्रकोप बढ़ जाता तो जीवन से निराश हो जाता, किंतु कई मास के पश्चात् जब उसे विश्वास हो गया कि इस रोग से मुक्त होना कठिन है तब उसने जीवन की भी चिंता छोड़ दी। का विचार न करता, घरवालों की निगाह बचाकर औषधियाँ जमीन पर गिरा देता । मित्रों के साथ बैठकर जी बहलाता। यदि कोई उससे स्वास्थ्य के विषय में कुछ पूछता तो चिढ़कर मुँह मोड़ लेता। उसके भावों में एक शांतिमय उदासीनता आ गई थी और बातों में एक दार्शनिक मर्मज्ञता पाई जाती थी। वह लोक-रोति और सामाजिक प्रथाओं पर बड़ी निर्भीकता से आलोचनाएँ किया करता यद्यपि बाबू चैतन्यदास के मन में रह-रहकर शंका उठा करती थी कि जब परिणाम विदित ही है तब इस प्रकार धन का अपव्यय करने से क्या लाभ, तथापि वे कुछ तो पुत्र-प्रेम और कुछ लोक-मत के भय से धैर्य के साथ दवा-दर्पण करते जाते थे।

जाड़े का मौसम था। चैतन्यदास पुत्र के सिरहाने बैठे हुए डॉक्टर साहब की ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देख रहे थे। जब डॉक्टर साहब टेम्परेचर लेकर (थर्मामीटर लगाकर) कुर्सी पर बैठे तब चैतन्यदास ने पूछा- "अब तो जाड़ा आ गया। आपको कुछ अंतर मालूम होता है ?"

डॉक्टर- बिलकुल नहीं, बल्कि रोग और भी दुस्साध्य होता जाता है।

चैतन्यदास ने कठोर स्वर में पूछा- "तब आप लोग क्यों मुझे इस भ्रम में डाले हुए थे कि जाड़े में अच्छे हो जाएँगे ? इस प्रकार दूसरों की सरलता का उपयोग करना अपना मतलब साधने का साधन हो तो हो. इसे सज्जनता कदापि नहीं कह सकते।"

डॉक्टर ने नम्रता से कहा- "ऐसी दशाओं में हम केवल अनुमान कर सकते हैं और अनुमान सदैव सत्य नहीं होते। आपको लेरबारी अवश्य हुई, पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मेरी इच्छा आपको भ्रम में डालने की नहीं थी।"

शिवदास बड़े दिन की छुट्टियों में आया हुआ था, इसी समय वह कमरे में आ गया और डॉक्टर साहब से बोला " आप पिता जी की कठिनाइयों का स्वयं अनुमान कर सकते हैं। अगर उनकी बात नागवार लगी, तो उन्हें क्षमा कीजिएगा।"

चैतन्यदास ने छोटे पुत्र की ओर वात्सल्य की दृष्टि से देखकर कहा- "तुम्हें यहाँ आने की क्या जरूरत थी ? मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि यहाँ मत आया करो, लेकिन तुमको सबर ही नहीं होता।"

शिवदास ने लज्जित होकर कहा- "मैं अभी चला जाता हूँ। आप नाराज न हों। मैं केवल डॉक्टर साहब से यह पूछना चाहता था कि भाई साहब के लिए अब क्या करना चाहिए।"

डॉक्टर साहब ने कहा " अब केवल एक ही साधन और है। इन्हें इटली के - किसी सेनेटोरियम में भेज देना चाहिए।"

चैतन्यदास ने सजग होकर पूछा- "कितना खर्च होगा ?" 'ज्यादा से ज्यादा तीन हज़ार साल-भर रहना होगा।'

'निश्चय है कि वहाँ से अच्छे होकर आवेंगे ?'

जी नहीं। यह तो एक भयंकर रोग है, साधारण बीमारियों में भी कोई बात रूप से नहीं कही जा सकती।' 'इतना खर्च करने पर भी वहाँ से ज्यों के त्यों लौट आए तो ?"

'तो ईश्वर की इच्छा आपको यह तसकीन हो जाएगी कि इनके लिए मैं जो

कुछ कर सकता था, कर दिया।'

आधी रात तक घर में प्रभुदास को, इटली भेजने के प्रस्ताव पर वाद-विवाद होता रहा। चैतन्यदास का कथन था कि एक संदिग्ध फल के लिए तीन हज़ार का खर्च उठाना बुद्धिमत्ता के प्रतिकूल है। शिवदास भी उनसे सहमत था, किंतु उसकी माता इस प्रस्ताव का बड़ी दृढ़ता के साथ विरोध कर रही थी। अंत में माता की धिक्कारों का फल हुआ कि शिवदास लज्जित होकर उसके पक्ष में हो गया। बाबू साहब अकेले रह गए। तपेश्वरी ने तर्क से काम लिया। पति के सद्भावों को प्रज्वलित करने की चेष्टा की। धन की नश्वरता की लोकोक्तियाँ कहीं। इन शस्त्रों से विजय- लाभ न हुआ तो अधु-वर्षा करने लगी। बाबू साहब जल-बिंदुओं के इस शर-प्रहार के सामने न ठहर सके। इन शब्दों में हार स्वीकार की- अच्छा भाई, रोओ मत। जो कुछ कहती हो वही होगा ।।

तपेश्वरी तो कब ?

'रुपये हाथ में आने दो।'

'तो यह क्यों नहीं कहते कि भेजना ही नहीं चाहते ?' 'भेजना चाहता हूँ किंतु अभी हाथ खाली है। क्या तुम नहीं जानतीं ?'

'बैंक में तो रुपये हैं ? जायदाद तो है ? दो-तीन हजार का प्रबंध करना ऐसा क्या कठिन है ?"

चैतन्यदास ने पत्नी को ऐसी दृष्टि से देखा मानो उसे खा जाएँगे और एक क्षण के बाद बोले -"बिलकुल बच्चों की-सी बातें करती हो। इटली में ऐसी कोई संजीवनी नहीं रखी हुई है, जो तुरंत चमत्कार दिखाएगी। जब वहाँ भी केवल प्रारब्ध ही की परीक्षा करनी है तो सावधानी से कर लेंगे। पूर्व पुरुषों की संचित जायदाद और रखे हुए रुपये मैं अनिश्चित हित की आशा पर बलिदान नहीं कर सकता।"

तपेश्वरी ने डरते-डरते कहा- "आखिर, आधा हिस्सा तो प्रभुदास का भी है ?” बाबू साहब तिरस्कार करते हुए बोले- "आधा नहीं, उसे मैं अपना सर्वस्व दे देता, जब उससे कुछ आशा होती, वह खानदान की मर्यादा और ऐश्वर्य बढ़ाता और इस लगाए हुए धन के फलस्वरूप कुछ कर दिखाता। मैं केवल भावुकता के फेर में पड़कर धन का ह्रास नहीं कर सकता।"

तपेश्वरी अवाक् रह गई। जीतकर भी उसकी हार हुई।

इस प्रस्ताव के छः महीने बाद शिवदास बी० ए० पास हो गया। बाबू चैतन्यदास ने अपनी जमींदारी के दो आने बंधक रखकर कानून पढ़ने के निमित्त उसे इंग्लैंड भेजा। बंबई तक पहुँचाने गए। वहाँ से लौटे तो उनके अंतःकरण में से लाभ होने की आशा थी। उनके लौटने के एक सप्ताह पीछे अभागा प्रभुदास अपनी उच्च अभिलाषाओं को लिए हुए परलोक सिधारा।

चैतन्यदास मणिकर्णिका घाट पर संबंधियों के साथ बैठे चिता ज्वाला की देख रहे थे। उनके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। पुत्र-प्रेम एक क्षण के लिए अर्थ-सिद्धांत पर गालिब हो गया था। उस विरक्तावस्था में उनके मन में यह कल्पना उठ रही थी संभव है, इटली जाकर प्रभुदास स्वस्थ हो जाता। हाय! मैंने तीन हज़ार का मुँह देखा और पुत्र रत्न को हाथ से खो दिया।" यह कल्पना प्रतिक्षण सजग होती थी और उनको ग्लानि, शोक और पश्चाताप के बाणों से बेघ रही थी। रह-रहकर उनके हृदय में वेदना की शूल-सी उठती थी। उनके अंदर की ज्वाला उस चिता ज्वाला से कम दग्धकारिणी न थी। अकस्मात् उनके कानों में शहनाइयों की आवाज आई। उन्होंने आँख ऊपर उठाई तो मनुष्यों का एक समूह एक अरथी के साथ आता हुआ दिखाई दिया। वे सब के सब ढोल बजाते, गाते, पुष्प आदि की वर्षा करते चले आते थे। घाट पर पहुँचकर उन्होंने अरथी उतारी और चिता बनाने लगे। उनमें से एक युवक आकर चैतन्यदास के पास खड़ा हो गया। बाबू साहब ने पूछा- "किस मुहल्ले में रहते हो ?"

युवक ने जवाब दिया- "हमारा घर देहात में है। कल शाम को चले थे। ये हमारे बाप थे। हम लोग यहाँ कम आते हैं, पर दादा की अंतिम इच्छा थी कि हमें मणिकर्णिका घाट पर ले जाना।"

चैतन्यदास- ये सब आदमी तुम्हारे साथ हैं ?

युवक हाँ, और लोग पीछे आते हैं। कई सौ आदमी साथ आए हैं। यहाँ तक - आने में सैकड़ों उठ गए पर सोचता हूँ कि बूढ़े पिता की मुक्ति तो बन गई। धन और है ही किसलिए।

चैतन्यदास उन्हें क्या बीमारी थी ?

युवक ने बड़ी सरलता से कहा, मानो वह अपने किसी निजी संबंधी से बात कर रहा हो- "बीमारी का किसी को कुछ पता नहीं चला। हरदम ज्वर चढ़ा रहता था। सूखकर काँटा हो गए थे। तीन वर्ष तक खाट पर पड़े रहे। जिसने जहाँ बताया लेकर गए । चित्रकूट, हरिद्वार, प्रयाग सभी स्थानों में ले-लेकर घूमे। वैद्यों ने जो कुछ कहा उसमें कोई कसर नहीं की।"

इतने में युवक का एक और साथी आ गया और बोला- “साहब, मुँह देखी बात नहीं, नारायण लड़का दे तो ऐसा दे। इसने रुपयों को ठीकरे समझा। घर की सारी पूँजी पिता की दवा-दारू में स्वाहा कर दी। थोड़ी-सी जमीन तक बेच दी पर काल बली के सामने आदमी का क्या बस है ?"

युवक ने गद्गद् स्वर से कहा- भैया, रुपया-पैसा हाथ का मैल है। कहाँ आता है, कहाँ जाता है, मनुष्य नहीं मिलता। जिंदगानी है तो कमा खाऊंगा, पर मन में यह लालसा तो नहीं रह गई कि हाय ! यह नहीं किया, उस वैद्य के पास नहीं गया, नहीं तो शायद बच जाते। हम तो कहते हैं कि कोई हमारा सारा घर-द्वार लिखा ले केवल दादा को एक बोल बुला दे। इसी माया-मोह का नाम जिंदगानी है, नहीं तो इसमें क्या रखा है ? धन से प्यारी जान, जान से प्यारा ईमान बाबू साहब, आपसे सच कहता हूँ, अगर दादा के लिए अपने बस की कोई बात उठा रखता तो आज रोते न बनता। अपना ही चित्त अपने को धिक्कारता नहीं तो मुझे इस घड़ी ऐसा जान पड़ता है कि मेरा उद्धार एक भारी ऋण से हो गया। उनकी आत्मा सुख और शांति से रहेगी तो मेरा सब तरह कल्याण ही होगा।"

बाबू चैतन्यदास सिर झुकाए ये बातें सुन रहे थे एक-एक शब्द उनके हृदय में शर के समान चुभता था। इस उदारता के प्रकाश में उन्हें अपनी हृदयहीनता, अपनी आत्मशून्यता, अपनी भौतिकता अत्यंत भयंकर दिखाई देती थी। उनके चित्त पर इस घटना का कितना प्रभाव पड़ा, यह इसी से अनुमान किया जा सकता है कि प्रभुदास के अंत्येष्टि संस्कार में उन्होंने हजारों रुपये खर्च कर डाले। उनके संतप्त हृदय की शांति के लिए अब एकमात्र यही उपाय रह गया था।

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