जामुन का पेड़



 रात को बड़े जोर का तेज आंधी चला। सिगरेट एरिया के लोन में जामुन का पेड़ गिर पड़ा। सुबह को जब हमार ने देखा तो उसे पता चला कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा हुआ है।

माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा दौड़ा कलर के पास नया, कलर के दौड़ा दौड़ा सुपरिटेंडेंट के पास गया, सुपरीटेंडेंट थोड़ा थोड़ा बाहर लॉन में आया। मिंटू में धीरे हुए पेड़ के नीचे दबे हुए आदमी ने चारों और भीड़ इकट्ठी हो गई थी।

"बेचारा जामुन का पेड़। कितना फलदार था!"- एक क्लर्क बोला।

 

" और इसकी जामुनें कितनी रसीली होती थीं!" - दूसरा क्लर्क याद करते हुए बोला ।

 

"मैं फलों के मौसम में झोली भरकर ले जाता था, मेरे बच्चे इसकी जामुनें कितनी खुशी से खाते थे।"- तीसरा क्लर्क लगभग रुआँसा होकर बोला।

 

"मगर यह आदमी ?" माली ने दबे हुए आदमी की तरफ इशारा किया।

 

“हाँ, यह आदमी।"- सुपरिंटेंडेंट सोच में पड़ गया।

 

"पता नहीं जिंदा है कि मर गया ?"- एक चपरासी ने पूछा ।

 

"मर गया होगा, इतना भारी पेड़ जिसकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है ?"- दूसरा चपरासी बोला।

 

"नहीं, मैं जिंदा हूँ।"- दबे हुए आदमी ने बड़ी कठिनता से कराहते हुए कहा। "ज़िंदा है !" - एक क्लर्क ने ताज्जुब से कहा ।

 


"पेड़ को हटाकर इसे जल्दी से निकाल लेना चाहिए।"- माली ने सुझाव

 

दिया । 'मुश्किल मालूम होता है," एक सुस्त, कामचोर और मोटा चपरासी बोला 44 "पेड़ का तना बहुत मोटा और वज़नी है।"

"क्या मुश्किल है ?" माली बोला- "अगर सुपरिटेंडेंट साहब हुक्म दें, तो अभी पंद्रह-बीस माली, चपरासी और क्लर्क लगाकर दबे हुए आदमी को निकाला जा सकता है।"

 


"माली ठीक कहता है", बहुत से क्लर्क एक साथ बोल पड़े- "लगाओ

 



जोर, हम तैयार हैं।"

 

एक साथ बहुत से लोग पेड़ को उठाने को तैयार हो गए।

 

"ठहरो!" सुपरिंटेंडेंट बोला- "मैं अंडर सेक्रेटरी से पूछ लूँ।"

 

सुपरिटेंडेंट अंडर-सेक्रेटरी के पास गया। अंडर सेक्रेटरी डिप्टी-सेक्रेटरी के पास गया। डिप्टी-सेक्रेटरी ज्वाइंट सेक्रेटरी के पास गया। ज्वाइंट सेक्रेटरी चीफ़ सेक्रेटरी के पास गया। चीफ़ सेक्रेटरी मिनिस्टर के पास गया। मिनिस्टर ने चीफ़ सेक्रेटरी से कुछ कहा। चीफ़ सेक्रेटरी ने ज्वाइंट सेक्रेटरी से कुछ कहा। ज्वाइंट सेक्रेटरी ने डिप्टी-सेक्रेटरी से कहा। डिप्टी सेक्रेटरी ने अंडर सेक्रेटरी से कहा। फाइल चलती रही। इसी में आधा दिन बीत गया।

 

दोपहर के खाने पर दबे हुए आदमी के चारों ओर बहुत भीड़ हो गई थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कुछ मनचले क्लकों ने समस्या को खुद ही सुलझाना चाहा। वे हुकूमत के फ़ैसले का इंतज़ार किए बिना पेड़ को अपने-आप हटा देने का निश्चय कर रहे थे, कि इतने में सुपरिंटेंडेंट फाइल लिए भागा भागा आया। बोला- "हम लोग खुद इस पेड़ को नहीं हटा सकते। हम लोग व्यापार विभाग से संबंधित हैं और यह पेड़ की समस्या है, जो कृषि विभाग के अधीन है। मैं इस फाइल को अर्जेंट मार्क करके कृषि विभाग में भेज रहा हूँ। वहाँ से उत्तर आते ही इस पेड़ को हटवा दिया जाएगा।"

 

दूसरे दिन कृषि विभाग से उत्तर आया कि पेड़ व्यापार-विभाग के लॉन में गिरा है, इसलिए इस पेड़ को हटवाने या न हटवाने की जिम्मेदारी व्यापार विभाग पर पड़ती है।

 

यह उत्तर पढ़कर व्यापार-विभाग को गुस्सा आ गया। उन्होंने फ़ौरन लिखा कि पेड़ों को हटवाने या न हटवाने की ज़िम्मेदारी कृषि-विभाग पर लागू होती है, व्यापार विभाग का इससे कोई संबंध नहीं है।

दूसरे दिन भी फाइल चलती रही। शाम को जवाब आ गया हम इस मामले को हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के हवाले कर रहे हैं, क्योंकि यह एक फलदार पेड़ का मामला है और एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट अनाज और खेती बाड़ी के मामलों में फ़ैसला करने का हकदार है। जामुन का पेड़ चूँकि एक फलदार पेड़ है, इसलिए यह पेड़ हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के अंतर्गत आता है।

 

रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया, जबकि उसके चारों तरफ पुलिस का पहरा था, कि कहीं लोग कानून को अपने हाथ में लेकर पेड़ को खुद ही हटाने की कोशिश न करें। मगर एक पुलिस कांस्टेबल को दया आ गई और उसने माली को दबे हुए आदमी को खाना खिलाने की इजाजत दे दी।

 

माली ने दबे हुए आदमी से कहा- "तुम्हारी फाइल चल रही है, उम्मीद है कल तक फ़ैसला हो जाएगा।"

 

दवा हुआ आदमी कुछ नहीं बोला।

 

माली ने फिर कहा- "तुम्हारा यहाँ कोई वारिस है तो मुझे उसका अता-पता

 

बताओ, मैं उन्हें खबर देने की कोशिश करूँगा।" "मैं लावारिस हूँ।'' दबे हुए आदमी ने बड़ी मुश्किल से कहा।

 

माली खेद प्रकट करता हुआ वहाँ से हट गया।

 

तीसरे दिन हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट से जवाब आ गया। बड़ा कड़ा जवाब था और व्यंग्यपूर्ण ।

 

हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी साहित्य-प्रेमी आदमी जान पड़ता था । उसने लिखा था- " आश्चर्य है, इस समय जब हम 'पेड़ लगाओ' स्कीम ऊँचे स्तर पर चला रहे हैं, हमारे देश में ऐसे सरकारी अफ़सर मौजूद हैं, जो पेड़ों को काटने का सुझाव देते हैं, और वह भी एक फलदार पेड़ को, और वह भी जामुन के पेड़ को, जिसके फल जनता बड़े चाव से खाती है! हमारा विभाग किसी हालत में इस फलदार वृक्ष को काटने की इजाजत नहीं दे सकता।"

 

'अब क्या किया जाए ? इसपर एक मनचले ने कहा- "अगर पेड़ काटा नहीं जा सकता, तो इस आदमी को ही काटकर निकाल लिया जाए।"

 

'यह देखिए," उस आदमी ने इशारे से बताया- "अगर इस आदमी को ठीक

बीच में से यानी धड़ से काटा जाए तो आधा आदमी इधर से निकल आएगा, आधा आदमी उधर से बाहर आ जाएगा और पेड़ वहीं का वहीं रहेगा।" "मगर इस तरह तो मैं मर जाऊँगा।" दबे हुए आदमी ने आपत्ति प्रकट करते

 

हुए कहा।

 

"यह भी ठीक कहता है!"- एक क्लर्क बोला। आदमी को काटने वाली युक्ति प्रस्तुत करने वाले ने भरपूर विरोध किया 'आप जानते नहीं हैं, आजकल प्लास्टिक सर्जरी कितनी उन्नति कर चुकी है। मैं तो समझता हूँ. अगर इस आदमी को बीच में से काटकर निकाल लिया जाए, तो प्लास्टिक सर्जरी से धड़ के स्थान से इस आदमी को फिर से जोड़ा जा सकता है।" इस बार फाइल को मेडिकल डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। मेडिकल डिपार्टमेंट

 

ने फ़ौरन एक्शन लिया और जिस दिन फाइल उनके विभाग में पहुँची, उसके दूसरे ही दिन उन्होंने अपने विभाग का सबसे योग्य प्लास्टिक सर्जन छान-बीन के लिए भेज दिया। सर्जन ने दबे हुए आदमी को अच्छी तरह टटोलकर, उसका स्वास्थ्य देखकर नाड़ी की गति को परखा। खून का दबाव देखा, दिल और फेफड़ों की जाँच करके रिपोर्ट भेज दी कि इस आदमी का प्लास्टिक ऑपरेशन तो हो सकता है और ऑपरेशन सफल भी होगा, मगर आदमी मर जाएगा।

 

इसलिए यह फ़ैसला भी रद्द कर दिया गया।

 

रात को माली ने दबे हुए आदमी के मुँह में खिचड़ी डालते हुए उसे बताया कि अब मामला ऊपर चला गया है। सुना है कि कल सेक्रेटेरियट के सारे सेक्रेटरियों की मीटिंग होगी। उसमें तुम्हारा केस रखा जाएगा। उम्मीद है सब काम ठीक हो जाएगा।"

 

दबा हुआ आदमी एक आह भरकर धीरे से बोला

 

"ये तो माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन, खाक हो जाएँगे हम तुमको खबर होने तक !"

 

माली ने अचंभे से मुँह में उँगली दबा ली और चकित भाव से बोला- "क्या तुम शायर हो?"

 

दबे हुए आदमी ने धीरे से सिर हिला दिया।

 

दूसरे दिन माली ने चपरासी को बताया, चपरासी ने क्लर्क को, क्लर्क ने हैड क्लर्क को। थोड़ी ही देर में सेक्रेटेरियट में यह अफवाह फैल गई कि दबा हुआ आदमी शायर है। बस, फिर क्या था। लोगों का झुंड शायर को देखने के लिए उमड़ पड़ा। इसकी चर्चा शहर में भी फैल गई और शाम तक गली-गली से शायर जमा होने शुरू हो गए। सेक्रेटेरियट का लॉन भाँति-भाँति के कवियों से भर गया और दबे हुए आदमी के चारों ओर कवि सम्मेलन का-सा वातावरण उत्पन्न हो गया। सेक्रेटेरियट के कई क्लर्क और अंडर सेक्रेटरी तक, जिन्हें साहित्य और कविता से लगाव था, रुक गए। कुछ शायर दबे हुए आदमी को अपनी कविताएँ और दोहे सुनाने लगे। कई क्लर्क उसको अपनी कविता पर आलोचना करने को मजबूर करने लगे।

 

जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी एक कवि है, तो सेक्रेटेरियट की सब कमेटी ने फ़ैसला किया कि चूँकि दबा हुआ आदमी एक कवि है, इसलिए इस फाइल का संबंध न एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से है, न हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट से, बल्कि सिर्फ़ कल्चरल डिपार्टमेंट से है। कल्चरल डिपार्टमेंट से अनुरोध किया गया कि. जल्द-से-जल्द मामले का फ़ैसला करके अभागे कवि को इस फलदार पेड़ से छुटकारा दिलाया जाए।

 

फाइल कल्चरल डिपार्टमेंट के अनेक विभागों से गुजरती हुई साहित्य अकादमी के सेक्रेटरी के पास पहुँची। बेचारा सेक्रेटरी उसी समय अपनी गाड़ी में सवार होकर सेक्रेटेरियट पहुंचा और दबे हुए आदमी से इंटरव्यू लेने लगा।

 

"तुम कवि हो ?" उसने पूछा।

 

"जी हाँ। " दबे हुए आदमी ने जवाब दिया। "किस उपनाम से शोभित हो ?"

 

"ओस।"

 

"ओस ?" सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा- "क्या तुम वही 'ओस' हो, जिसका गद्य-संग्रह 'ओस के फूल' अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।"

 

दबे हुए कवि ने हुँकार में सिर हिलाया।

 

"क्या तुम हमारी अकादमी के मेंबर हो ?"-सेक्रेटरी ने पूछा।

 

"नहीं!”

'आश्चर्य है", सेक्रेटरी जोर से चीखा- "इतना बड़ा कवि- 'ओस के फूल' का लेखक और हमारी अकादमी का मेंबर नहीं है। उफ्, कैसी भूल हो गई हमसे ! कितना बड़ा कवि और कैसी अंधेरी गुमनामी में दबा पड़ा है।"

 

"गुमनामी में नहीं एक पेड़ के नीचे दबा है, कृपया मुझे इस पेड़ के नीचे से निकालिए।" "अभी बंदोबस्त करता हूँ।" सेक्रेटरी फ़ौरन बोला और फ़ौरन उसने अपने

 

विभाग में रिपोर्ट की ।

 

दूसरे दिन सेक्रेटरी भागा-भागा कवि के पास आया और बोला- "मुबारक हो, मिठाई खिलाओ, हमारी सरकारी साहित्य अकादमी ने तुम्हें अपनी केंद्रीय शाखा का मँबर चुन लिया है, यह लो चुनाव- पत्र।"

 

"मगर मुझे इस पेड़ के नीचे से तो निकालो।" दबे हुए आदमी ने कराहकर

 

कहा। उसकी साँस बड़ी मुश्किल से चल रही थी और उसकी आँखों से मालूम होता

 

था कि वह घोर पीड़ा और दुख में पड़ा है।

 

"यह हम नहीं कर सकते।" सेक्रेटरी ने कहा- "और जो हम कर सकते थे, वह हमने कर दिया है, बल्कि हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि अगर तुम मर जाओ, तो तुम्हारी बीवी को वज़ीफ़ा' दे सकते हैं, अगर तुम दरखास्त दो, तो हम वह भी कर सकते हैं। "

 

"मैं अभी जीवित हूँ।" कवि रुक-रुककर बोला- "मुझे शिंदा रखो।"

 

"मुसीबत यह है," सरकारी साहित्य अकादमी का सेक्रेटरी हाथ मलते हुए बोला- "हमारा विभाग सिर्फ़ कल्चर से संबंधित है। पेड़ काटने का मामला कलम दवात से नहीं, आरी-कुल्हाड़ी से संबंधित है। उसके लिए हमने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को लिख दिया है और अर्जेंट लिखा है।"

 

शाम को माली ने आकर दबे हुए आदमी को बताया- "कल फॉरस्ट डिपार्टमेंट

 

के आदमी आकर इस पेड़ को काट देंगे और तुम्हारी जान बच जाएगी।"

 

माली बहुत खुश था। दबे हुए आदमी का स्वास्थ्य जवाब दे रहा था, मगर वह किसी न किसी तरह अपने जीवन के लिए लड़े जा रहा था। कल तक कल सवेरे तक... किसी-न-किसी तरह उसे जीवित रहना है।

दूसरे दिन जब फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आदमी आरी, कुल्हाड़ी लेकर पहुँचे तो उनको पेड़ काटने से रोक दिया गया। मालूम हुआ कि विदेश विभाग से हुक्म आया था कि इस पेड़ को न काटा जाए। कारण यह था कि इस पेड़ को दस साल पहले पीटोनिया राज्य के प्रधानमंत्री ने सेक्रेटेरियट के लॉन में लगाया था। अब अगर यह पेड़ काटा गया, तो इस बात का काफी अंदेशा था कि पीटोनिया सरकार से हमारे संबंध सदा के लिए बिगड़ जाएँगे।

 

"मगर एक आदमी की जान का सवाल है।"- एक क्लर्क चिल्लाया। "दूसरी ओर दो राज्यों के संबंधों का सवाल है," दूसरे क्लर्क ने पहले क्लर्क को समझाया- "और यह भी तो समझो कि पोटोनिया सरकार हमारे राज्य को कितनी सहायता देती है। क्या हम उनकी मित्रता की खातिर एक आदमी के जीवन का भी बलिदान नहीं कर सकते ?"

 

"कवि को मर जाना चाहिए।"

 

"निस्संदेह ।"

 

अंडर सेक्रेटरी ने सुपरिटेंडेंट को बताया- "आज सवेरे प्रधानमंत्री दौरे से वापस आ गए हैं। आज चार बजे विदेश विभाग इस पेड़ की फाइल उनके सामने पेश करेगा। जो वे फ़ैसला देंगे, वही सबको स्वीकार होगा।"

 

शाम के पाँच बजे स्वयं सुपरिटेंडेंट कवि की फाइल लेकर उसके पास आया, "सुनते हो।" आते ही वह खुशी से फाइल को हिलाते हुए चिल्लाया- "प्रधानमंत्री ने इस पेड़ को काटने का हुक्म दे दिया है और इस घटना की सारी अंतर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने सिर ले ली है। कल यह पेड़ काट दिया जाएगा और तुम इस संकट से छुटकारा हासिल कर लोगे सुनते हो ? आज तुम्हारी फाइल पूर्ण हो गई।" मगर कवि का हाथ ठंडा था, आँखों की पुतलियाँ निर्जीव और चींटियों की एक लंबी पाँत' उसके मुँह में जा रही थी

 

उसके जीवन की फाइल भी पूर्ण हो चुकी थी।

 

कृष्ण चंदर।

 

 

 

2) बड़े घर की बेटी कहानी

 

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नंबरदार थे। उसके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य से संपन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर, जिसकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्ति स्तंभ थे। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय एक हजार वार्षिक से अधिक न थीं।

 

ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी० ए० की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल बिहारी सिंह दोहरे बदन का सजीला जवान था - भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह सवेरे उठकर पी जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिल्कुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय गुणों को 'बी० ए०' इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्मल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था।

 

श्रीकंठ इस अंग्रेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी पाश्चात्य सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे, बल्कि वे बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। दशहरे के दिनों में वे बड़े उत्साह से रामलीला में सम्मिलित होते और स्वयं किसी न किसी पात्र का अभिनय करते थे। प्राचीन सभ्यता का गुणगान उनकी प्रकृति का प्रधान अंग था। सम्मिलित कुटुंब के तो वे एकमात्र उपासक थे। आजकल स्त्रियों को कुटुंब में मिल-जुलकर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गाँव की ललनाएँ उनकी निंदक थीं। कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न करती थीं। स्वयं उनकी पत्नी को इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि से घृणा थी बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत कुछ सहने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके तो आये दिन के कलह से

जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा अच्छा है कि अपनी खिचड़ी अलग पकाई जाए।

 

आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार" थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते आनरेरी मजिस्ट्रेटी और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के योग्य पदार्थ हैं, सभी यहाँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह। बड़े उदार चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे। पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था। आनंदी चौथी लड़की थी। वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुंदर संतान को कदाचित उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि आनंदी का विवाह कहाँ करें ? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न यही स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ सिंह उनके पास किसी चंदे का रुपया मांगने आए। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से श्रीकंठ सिंह का आनंदी के साथ विवाह हो गया।

 

आनंदी अपने नये घर में आई तो यहाँ रंग-ढंग कुछ और देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहाँ नाममात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लाई थी, पर यहाँ बाग कहाँ, जहाँ वह सैर करती ? मकान में खिड़कियाँ तक न थी न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें वह एक सीधा-साधा देहाती गृहस्थ का मकान था, किंतु आनंदी ने थोड़े दिनों में ही अपने आप को इस नई परिस्थिति के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानो विलास के सामान कभी देखे ही न थे।

 

एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़ियाँ लिए हुए आया और भावज से बोला "जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है।" आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी। हाँडी में देखा तो घी पाव भर से अधिक न था। बड़े घर की बेटी किफ़ायत' क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा तो दाल में घी न था। बोला "दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा ?"

आनंदी ने कहा, "धी सब मांस में पड़ गया।' लालबिहारी जोर से बोला," परसों भी आया है इतनी जल्दी उठ गया।" आनंदी ने उत्तर दिया, "आज तो कुछ पाव भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस अभी

 

में डाल दिया।"

 

जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई। तिनककर बोला 'मैंके में तो जैसे घी की नदी बहती हो।"

 

स्वी गालियाँ सह लोती है, भार भी सह लेती है, पर उससे मैके की निंदा नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली, "हाथी मरा भी तो नौ लाख का । वहाँ इतना घी तो नित्य नाई कहार खा जाते हैं। "

 

लालबिहारी जल गया। थाली उठाकर पटक दी और बोला, जी चाहता है, "जीभ खींच लूँ।” आनंदी को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो उठा। बोली, 'वे होते तो आज इसका मजा चखा देते। '

 

अब अनपढ़, उजड्ड लालबिहारी से न रहा गया। खड़ाऊँ' उठाकर आनंदी की ओर जोर से फेंकी और बोला, 'जिसके गुमान पर फूली हुई हो, उसे भी देखूंगा और तुम्हें भी।'

 

आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया, पर ऊँगली में काफी चोट आई। क्रोध के मारे हवा से हिलते हुए पत्ते की भांति काँपती हुई अपने कमरे में आकर खड़ी हो गई। स्त्री का बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। आनंदी खून का घूँट पीकर रह गई।

 

श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। वृहस्पतिवार को यह घटना घटी थी। दो दिन तक आनंदी कोपभवन में रही। न कुछ खाया, न कुछ पिया, बस श्रीकंठ की बाट देखती रही। अंत में शनिवार को वे नियमानुसार संध्या समय घर आए, और बाहर बैठकर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ

नये मुकदमें आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे राततक होती रही। गाँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुध न रहती थी। श्रीकंठ सिंह को पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घण्टे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे। किसी तरह भोजन का समय आया पंचायत उठ गई। एकांत हुआ तो लालबिहारी ने कहा- 'भैया आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह संभालकर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायेगा।"

 

बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर से साक्षी दी, “हाँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मुँह लगे।"

 

लालबिहारी बोला, "ये बड़े घर की बेटी है तो हम भी कोई कुम-कहार नहीं हैं।" श्रीकंठ ने चिन्तित स्वर से पूछा, "आखिर बात क्या हुई?"

 

लालबिहारी ने कहा, "कुछ भी नहीं, यों ही आप ही आप उलझ पड़ी। मैके के

 

सामने हम लोगों को कुछ समझती ही नहीं।"

 

श्रीकंठ खा-पीकर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। ये हज़रत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा, "चित्त तो प्रसन्न है ?"

 

श्रीकंठ सिंह बोले, 'बहुत प्रसन्न है पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा था ?'

 

आनंदी की त्योरी चढ़ गई। झुंझलाहट के मारे बदन में ज्वाला सी दहक उठी। बोली 'जिसने तुमसे यह आग लगाई है, उसे पाऊँ तो मुँह झुलस दूँ।” इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कही।

 

"क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है, नहीं तो एक धारा छोकरा, जिसको चपरासीगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मारकर यों अकड़ता । "सब हाल साफ-साफ कहो, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ भी पता नहीं।"

 

" परसों तुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हाँडी में पावभर से अधिक न था। वह सब मैंने माँस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा, 'दाल में भी क्यों नहीं है ?' बस, इसी पर वह मेरे मैके को भी भला-बुरा कहने

लगा। मुझसे रहा न गया। मैंने कहा कि वहाँ इतना घी तो नाई कहार खा जाते हैं और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर उस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लेती तो सिर फट जाता। उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहा वह सच है या झूठ।

 

श्रीकंठ की आँखें लाल हो गई। बोले, 'यहाँ तक हो गया उस छोकरे का

 

साहस।"

 

आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी क्योंकि आँसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ धैर्यवान और शांत पुरुष थे। उन्हें कदाचित ही क्रोध आता था, पर स्त्रियों के आँसू पुरुषों को क्रोधाग्नि भड़काने में घी का काम देते हैं। रात भर करवट बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी प्रातःकाल अपने बाप के पास जाकर बोले "दादा, अब इस घर में मेरा निर्वाह न होगा। "

 

इस तरह की विद्रोहपूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ सिंह ने कितनी ही बार अपने

 

मित्रों को आड़े हाथ लिया था। परंतु दुर्भाग्यवश आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने

 

मुँह से कहनी पड़ी। दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज है?

 

बेनीमाधव सिंह घबड़ा उठे और बोले, "क्यों ?"

 

श्रीकंठ सिंह बोले, "इसलिए कि मुझे भी अपनी प्रतिष्ठा का कुछ ख्याल है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रयोग हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा, घर पर रहता नहीं। यहाँ मेरे पीछे स्वियों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछार होती है। कड़ी बात तक ही हो तो चिन्ता नहीं कोई एक-दो कह ले, वहाँ तक मैं सह सकता हूँ। किंतु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूंसे पडे और मैं मुँह न खोलूँ।"

 

बेनीमाधव सिंह कुछ जबाव न दे सके। श्रीकंठ सिंह सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढ़ा अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला, "बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो ? स्त्रियाँ इसी तरह घर का नाश कर देती हैं। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं। "

श्रीकंठ सिंह ने उत्तर दिया, "इतना मैं जानता हूँ आपके आशीर्वाद से मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं मेरे ही समझाने-बुझाने से इसी गाँव में कई घर सम्भल गए। पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता है, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार असा है। आप सच मानिए, मेरे लिये यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दण्ड नहीं दिया।"

 

अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाए। ऐसी बात और न सुन सके। बोले, "लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे कभी भूल-चूक हो, उसके कान पकड़ो, लेकिन.

 

"लालबिहारी को मैं अपना भाई नहीं समझता।"

 

"स्त्री के पीछे ?" "जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।"

 

दोनों कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गाँव के और कई सज्जन हुक्के चिलम के बहाने वहाँ आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ सिंह पत्नी के पीछे पिता से लड़ने पर तैयार हैं तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर वाणियों सुनने के लिए उनकी आत्माएँ अकुलाने लगीं। गाँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। इन महानुभावों की शुभकामाएँ आज पूरी होती दिखाई दी। कोई हुक्का पीने और कोई लगान की रसीद दिखाने के बहाने आकर बैठ गए।

 

बेनीसिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को ताड़ गए। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ भी क्यों न हो, इस द्वेषियों को ताली बजाने का अवसर न दूंगा। तुरंत कोमल शब्दों में बोले, "बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तुम्हारा जी जो चाहे करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।"

 

इलाहाबाद का अनुभव रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथकण्डों की उसे क्या खबर ? बाप ने जिस मतलब से बात पलटी थी, वह उसकी समझ में न आयी बोला, "मैं लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।"

बेनीमाधव सिंह ने पुचकारा, "बेटा, बुद्धिमान लोग मूखों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई तुम बड़े होकर क्षमा करो। "

 

श्रीकंठ सिंह को आवेश आ गया। बोले, "उसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वहीं घर में रहेगा या मैं ही। आपको यदि वह अधिक प्यारा है तो मुझे विदा कीजिए। मैं अपना भार सम्भाल लूंगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहाँ चाहे चला जाए। बस यह मेरा अन्तिम निश्चय है।"

 

लालबिहारी दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाए, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह लिहाज न करता था जितना बड़े भाई का। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह इलाहाबाद से आते तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्योढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जाकर उसे गले से लगा लिया और पाँच रुपए के पैसे लुटाए थे।

 

ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय विदारक बात सुनकर लाल बिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूटकर रोने लगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किए पर वह पछता रहा था। भाई के आने के एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूं भैया क्या कहते हैं? मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊँगा। उनसे कैसे बोलूंगा। मेरी उनके सामने कैसे उठेंगी ? उसने समझा था कि भैया मुझे बुला कर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हें कठोरता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था, परन्तु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ सिंह उसे अकेले में बुलाकर दो-चार कड़ी बात कह देते, इतना ही नहीं, दो चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित उसे इतना दुख न होता, पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह रोता हुआ घर आया। कोठरी में जाकर कपड़े पहने, आँखें पोंछी, जिससे कोई यह न समझे, कि वह रो रहा था। इसके उपरान्त वह आनंदी के द्वार पर आकर बोला,

"भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वे मेरा मुँह भी नहीं देखता चाहते, इसलिए मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊंगा। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।'

 

जिस समय लालबिहारी सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ा था उसी समय श्रीकंठ सिंह भी आँखें लाल किए बाहर से आए भाई ने देखा तो घृणा से आँखें फेर 'लीं और कतराकर निकल गए। मानो उसकी परछाई से दूर भागना चाहते हैं।

 

आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी। वह स्वभाव से ही दयालु थी उसे इसका तनिक भी न ध्यान था कि बात इतनी बढ़ जाएगी। वह मन में अपने पति पर झुंझला रही थी कि ये इतने गरम क्यों होते हैं। जब उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ हुआ, क्षमा करना, तो उसका रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं हैं।

 

श्रीकंठ को देखकर "तो मैं क्या करूँ ?" आनंदी ने कहा, "लाल बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।"

 

'भीतर बुला लो मेरी जीभ में आग लगे। मैंने कहाँ से झगड़ा उठाया।'

 

“मैं नहीं बुलाऊँगा”

 

" पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गई है, ऐसा न हो कि वह चल दें।"

 

श्रीकंठ सिंह न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा, "भाभी भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वे मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसीलिए मैं अपना मुँह उन्हें न दिखाऊंगा।"

 

लालबिहारी इतना कह लौट पड़ा और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे मुड़कर देखा और आँखों में आँसू भर कर बोला 'मुझे जाने दो।'

 

"कहाँ जा रहे हो ?"

" जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे। "

 

"मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।"

 

"तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ना।"

 

'जब तक मुझे यह न मालूम हो जाए कि भैया का मन मेरी तरफ़ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।"

 

श्रीकंठ सिंह का हृदय भी पिघला । उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले से लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूट कर रोए। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा, अब कभी मत कहिएगा कि तुम्हारा मुँह न देखूंगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा ।"

 

श्रीकंठ ने काँपते हुए स्वर में कहा, "लल्लू! इन बातों को बिलकुल भूल

 

जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आएगा।"

 

बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गए और बोल उठे, “बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं। "

 

गाँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा- "बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।"

 

प्रेमचंद।

 

 

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अगले दिन फिर से मैं कहानी पोस्ट करने जा रहा हूं अगले दिन|

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" जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे। "


"मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।"


"तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ना।"


'जब तक मुझे यह न मालूम हो जाए कि भैया का मन मेरी तरफ़ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।"


श्रीकंठ सिंह का हृदय भी पिघला । उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले से लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूट कर रोए। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा, अब कभी मत कहिएगा कि तुम्हारा मुँह न देखूंगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा ।"


श्रीकंठ ने काँपते हुए स्वर में कहा, "लल्लू! इन बातों को बिलकुल भूल


जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आएगा।"


बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गए और बोल उठे, “बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं। "


गाँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा- "बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।"


प्रेमचंद

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